– कर्मचारियों के हक पर कटौती, संस्थाचालकों को पूरा लाभ?
– 10 साल सेवा का इनाम या अन्याय: वेतन अब भी अधूरा
बूटीबोरी :- महाराष्ट्र में दिव्यांग शालाओं की अनुदान व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति सामने आई है. राज्य की 123 ‘अ’ श्रेणी की दिव्यांग शालाओं को 8 अप्रैल 2015 को शासन द्वारा 100% अनुदान देने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया था. इस निर्णय के तहत शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों को पूर्ण वेतन अनुदान देने के साथ-साथ संस्था चालकों को परिपोषण और भवन किराया भी 100% देने के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे.
यह निर्णय उन हजारों कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया था, जिन्होंने 2005 से 2015 तक बिना वेतन सेवा दी थी. लेकिन हकीकत में इस निर्णय का पूरी तरह से अमल नहीं हो पाया. आरोप है कि कुछ संस्था चालकों की मनमानी और दिव्यांग कल्याण विभाग की उदासीनता के कारण यह फैसला केवल कागजों तक ही सीमित रह गया. इसके बाद 8 नवंबर 2018 को शासन ने एक और विवादास्पद निर्णय लेते हुए कर्मचारियों को केवल 50% वेतन देने और पिछली बकाया राशि शून्य करने का आदेश जारी किया. वहीं दूसरी ओर, इसी अवधि में संस्था चालकों को परिपोषण और भवन किराया 100% जारी रहने की बात सामने आई है. इस स्थिति ने कर्मचारियों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है. दिव्यांग विद्यार्थियों को शिक्षित करने वाले शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी और सेवक वर्ग आज भी आधे वेतन में अपने परिवार का भरण-पोषण करने को मजबूर हैं. घर का खर्च, बच्चों की शिक्षा, इलाज, कर्ज की किस्तें और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है. कई कर्मचारियों को कर्ज लेना पड़ा, कुछ ने अपनी संपत्ति तक बेच दी, जबकि कई परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, संस्थाचालकों को शासन की ओर से परिपोषण और भवन किराया के नाम पर लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक का अनुदान मिलने की चर्चा है. कुछ मामलों में एक ही संस्था चालक द्वारा संचालित दो शालाओं के लिए सालाना करोड़ों रुपये मिलने की बात भी सामने आ रही है.
दस्तावेजों में अटका वेतन, करोड़ों का अनुदान जारी
कर्मचारियों का सवाल है कि यदि शालाओं के लिए इतना बड़ा अनुदान उपलब्ध है, तो उन्हीं शालाओं में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों को पूर्ण वेतन क्यों नहीं दिया जा सकता? उनका कहना है कि वे सुबह से शाम तक सेवा भाव से काम करते हैं, वहीं निवासी शालाओं में कार्यरत कर्मचारी 24 घंटे जिम्मेदारी निभाते हैं, इसके बावजूद उन्हें आधे वेतन पर ही संतोष करना पड़ रहा है. इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप यह भी है कि जब संस्थाचालकों के बिलों को मंजूरी देने की बात आती है, तो प्रक्रिया तेजी से पूरी हो जाती है, जबकि कर्मचारियों के वेतन से संबंधित फाइलों में ‘दस्तावेज’, ‘जांच’ और ‘प्रक्रिया’ जैसे कारणों का हवाला देकर देरी की जाती है.
बढ़ता असंतोष, आंदोलन की चेतावनी
वर्तमान स्थिति में जहां एक ओर संस्थाचालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती दिख रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है. इससे व्यवस्था की पारदर्शिता और संवेदनशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं, दिव्यांग विद्यार्थियों के नाम पर मंजूर होने वाले अनुदान के बावजूद, उन्हें शिक्षित करने वाले कर्मचारियों की उपेक्षा को लेकर अब व्यापक स्तर पर आवाज उठने लगी है. कर्मचारियों का साफ कहना है कि यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा.