– सरकारी सेवा केंद्र बना धांधली का अड्डा, पुलिस की खामोशी पर सवाल
मुंबई :- क्या राज्य चुनाव आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चोकलिंगम कभी मतदाता सूची में अनियमितताओं का पता लगाने के लिए सभी संबंधित जिला कलेक्टरों को जाँच का आदेश देंगे? अगर वे ऐसा साहस दिखाते हैं, तो विदर्भ के साथ-साथ पूरे राज्य में हुई अनियमितताओं की भी जाँच होगी। क्या इससे सच सामने आएगा? क्या इसके पीछे के मास्टरमाइंड के खिलाफ कार्रवाई होगी? इन मास्टरमाइंडों के पीछे आखिर कौन सा तंत्र काम कर रहा था? क्या इसमें कोई सरकारी अधिकारी शामिल था? अगर हाँ, तो वे वास्तव में कौन थे? क्या राज्य आयोग या संबंधित जिला कलेक्टर उन्हें कार्रवाई के जाल में फँसाने का साहस दिखाएँगे? क्या यह आयोग की स्वायत्तता को बचाए रखने का प्रयास होगा? ऐसे कई सवालों के जवाब मिलना मुश्किल है। क्योंकि यही स्थिति है।
अगर हम यह देखना चाहते हैं कि यह कैसे होता है, तो सबसे पहले राजुरा के मामले को देखते हैं। यहाँ एक सेवा केंद्र के माध्यम से मतदाता सूची में नाम जोड़े और हटाए जाते थे। ये केंद्र सरकारी अधिकारियों द्वारा शुरू किए गए थे। इनका दायरा पूरे राज्य में है। इसके पीछे स्पष्ट कारण यह है कि लोगों को सरकारी सेवाओं का लाभ मिलना चाहिए। हालांकि अभी यह कहना संभव नहीं है कि इसके पीछे क्या छिपा मकसद था, लेकिन गड़चांदूर केंद्र के मामले में यह उजागर हो चुका है। राजुरा में सामने आई तमाम अनियमितताओं की जड़ यही केंद्र था। पुलिस में दर्ज शिकायत और बाद में दर्ज अपराध डायरी में इसका स्पष्ट उल्लेख है। यह केंद्र एक स्थानीय भाजपा नेता द्वारा चलाया जा रहा था। पुलिस और प्रशासन को यह सारी जानकारी होने के बावजूद, पुलिस साल भर तक इस केंद्र पर छापा मारने की हिम्मत नहीं दिखा पाई। इसका जवाब इस सवाल में छिपा है कि इस अनियमितता का मास्टरमाइंड कौन है।




