नागपुर/सावनेर :- नागपुर जिले सहित अनेक तहसीलों में अवैध रेत उत्खनन और परिवहन का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। खासकर सावनेर तहसील में इसको लेकर चर्चाएं सबसे ज्यादा तेज हैं, जहां रेत के अवैध कारोबार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, कुछ स्थानों पर रेत भरकर निकले ट्रक घाट से बाहर निकलते ही, थोड़ी दूरी पर GPS सिस्टम के कथित दुरुपयोग का खेल शुरू होने की बात सामने आ रही है। आरोप है कि इस तरीके से रॉयल्टी प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है, जिससे शासन को बड़े पैमाने पर राजस्व नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।प्राप्त जानकारी के मुताबिक, रेत ढोने वाले ट्रकों में लगाए गए GPS डिवाइस के साथ छेड़छाड़ कर एक नया तरीका अपनाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि ट्रकों से GPS डिवाइस निकालकर अलग वाहन—जैसे कार या बाइक में रख दिया जाता है। फिर वह वाहन निर्धारित मार्गों, जैसे अकोला, अमरावती एवं अन्य दिशा में चलता रहता है ओर उसी निर्धारित मार्ग पर दूर स्थान पर खड़ा रहता है, जिससे सिस्टम में ट्रक की लोकेशन सामान्य रूप से दर्ज होती रहती है।
चर्चा है कि इसी दौरान, संबंधित ट्रक स्थानीय क्षेत्र विशेषकर सावनेर, कमलेश्वर ,काटोल , नरखेड जैसे शहरों के आसपास में ही रहकर कथित तौर पर बिना वैध रॉयल्टी के कई बार रेत की ढुलाई करता रहता है, साथ ही चर्चा यह भी है कि एक ही रॉयल्टी का उपयोग कर कई ट्रिप मारी जा रही है, जिससे प्रतिदिन लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक के राजस्व नुकसान की संभावना जताई जा रही है।
माइनिंग तंत्र पर सवाल
अगर यह मामला सही पाया जाता है, तो यह न केवल आर्थिक अनियमितता का विषय है, बल्कि प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। GPS जैसे आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम के बावजूद इस तरह की संभावित गड़बड़ियों की गुंजाइश चिंता का विषय बनी हुई है। अगर समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो शासन को होने वाला आर्थिक नुकसान और बढ़ सकता है, साथ ही अवैध खनन की समस्या भी गंभीर रूप ले सकती है।
जनता द्वारा उठ रहे अहम सवाल
क्या संबंधित विभागों को इस कथित ‘GPS खेल’ की जानकारी है या नहीं?
यदि जानकारी है, तो अब तक इस पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
GPS जैसे आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम के बावजूद ऐसी छेड़छाड़ कैसे संभव हो रही है?
क्या रेत घाटों पर निगरानी व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है?
एक ही रॉयल्टी पर कई ट्रिप होने की आशंका पर अब तक जांच क्यों नहीं हुई?
क्या इस पूरे मामले में किसी स्तर पर मिलीभगत की संभावना से इनकार किया जा सकता है?
शासन को हो रहे संभावित करोड़ों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई सख्त और पारदर्शी सिस्टम लागू किया जाएगा?
जांच और कार्रवाई की मांग
स्थानीय स्तर पर नागरिकों और जागरूक लोगों द्वारा मांग की जा रही है कि:
पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
GPS ट्रैकिंग डेटा और रॉयल्टी रिकॉर्ड का मिलान किया जाए
संबंधित घाटों और वाहनों की सघन जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए
परिवहन पर कार्रवाई, लेकिन स्रोत पर सन्नाटा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन वाहनों को पकड़ा गया, वह रेत आखिर किन घाटों से निकाली गई? अब तक इस पर कोई स्पष्ट और ठोस जानकारी सामने नहीं आई है। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि कार्रवाई केवल परिवहन तक सीमित रह गई है, जबकि अवैध उत्खनन करने वाले असली स्रोतों पर अपेक्षित सख्ती नहीं हो रही।
हाई कोर्ट जाने की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले को लेकर सामाजिक मंडल जल्द ही उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। इसमें मांग की जा सकती है कि:
पकड़े गए सभी अवैध रेत परिवहन मामलों की गहन जांच हो
यह पता लगाया जाए कि रेत किन घाटों से लाई गई
संबंधित घाटों और जिम्मेदार लोगों पर भी कड़ी कार्रवाई की जाए