चंद्रपुर :- “कानून सबके लिए बराबर है,” यह जुमला महाराष्ट्र सरकार और जिला प्रशासन की फाइलों में तो खूब चमकता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। चंद्रपुर का भूमि अभिलेख विभाग (SLR) आज एक ऐसे सिंडिकेट का अड्डा बन चुका है, जहां सरकारी नियम नहीं, बल्कि कुछ खास अफसरों की ‘अर्थनीति’ चलती है। राज्य सरकार के ट्रांसफर नियमों को जूते की नोक पर रखकर, कुछ साहबान पिछले 22 सालों से एक ही जिले, एक ही दफ्तर और एक ही कुर्सी से चिपके हुए हैं। सवाल खड़ा होता है—”अगर मंत्रालय मेहरबान है, तो क्या हमारे कलेक्टर साहिबान वाकई बेबस हैं?”
22 साल का ‘राजपाट’: सेवा या मेवा?
नियम कहता है कि सरकारी कर्मचारी की हर तीन साल में बदली होनी चाहिए। लेकिन भूमि अभिलेख विभाग के इन ‘भाग्यशाली’ अफसरों के लिए शायद संविधान अलग से लिखा गया है। 22 साल! एक लंबा अरसा होता है, जिसमें एक पूरी पीढ़ी जवान हो जाती है, लेकिन इन साहबों का मोह इस कुर्सी से भंग नहीं हुआ। यह महज प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि एक गहरी साजिश की बू देती है। आखिर इस कुर्सी में ऐसा कौन सा ‘सोने का अंडा’ छिपा है कि ये अफसर यहां से हिलने का नाम नहीं ले रहे? क्या यह इनकी कार्यक्षमता है या फिर करोड़ों का वो लेन-देन, जिसने नियमों की आंखों पर पट्टी बांध दी है?
कलेक्ट्रेट की चुप्पी: सवालों के घेरे में प्रशासन
महाराष्ट्र सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के आदेशों का उल्लंघन चंद्रपुर कलेक्ट्रेट की नाक के नीचे हो रहा है। क्या जिला प्रशासन इतना कमजोर हो गया है कि वह इन जमे हुए अंगदों के पैर हिला नहीं पा रहा? प्रशासनिक गलियारों में दबी जुबान से चर्चा है कि इन अफसरों के तार सीधे मंत्रालय की ऊंची कुर्सियों से जुड़े हैं। जब भी बदली की फाइल हिलती है, मंत्रालय से एक ‘अदृश्य फोन’ आता है और नियम ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। क्या कलेक्टर साहिबान वाकई नियमों को लागू करवाने में फेल हो गए हैं, या फिर इसके पीछे कोई बड़ी मजबूरी है?
जमीनों का खेल और ‘अर्थनीति’ का चमत्कार
भूमि अभिलेख विभाग सीधे आम आदमी की मेहनत की कमाई यानी उसकी ‘जमीन’ से जुड़ा है। सीमा विवाद सुलझाना हो, जमीन की पैमाइश (मोजणी) करनी हो या रिकॉर्ड दुरुस्त करना हो—इन ‘पुराने चावलों’ ने भ्रष्टाचार का ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है कि बिना ‘सेवा शुल्क’ दिए पत्ता भी नहीं हिलता। 22 सालों के अनुभव का इस्तेमाल इन्होंने जनता की सेवा में कम और अपनी समांतर सत्ता खड़ी करने में ज्यादा किया है। सूत्रों की मानें तो इन अफसरों ने जमीन के बड़े-बड़े सौदों में अपनी पैठ बना ली है, जिससे इनकी ‘अर्थनीति’ भारी पड़ने लगी है।
मंत्रालय का ‘सुरक्षा कवच’ और लचर व्यवस्था
यह खबर उन ईमानदार अधिकारियों के मुंह पर तमाचा है जो हर तीन साल में अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर निकल पड़ते हैं। आखिर मंत्रालय में बैठा वो कौन सा ‘आका’ है जो इन पर मेहरबान है? सरकार पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन जब 22 साल से जमे हुए अफसरों की बारी आती है, तो पारदर्शिता धुंधली पड़ जाती है। क्या यह महाराष्ट्र सरकार की छवि को धूमिल करने की कोशिश नहीं है?
जनता का सवाल: कब टूटेगा यह तिलिस्म?
चंद्रपुर की जनता आज प्रशासन से सीधी जवाबदेही मांग रही है। जिस जिले के आला अधिकारी अपनी सख्त कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं, वहीं ये ‘वीआईपी’ अफसर नियमों को ठेंगा कैसे दिखा रहे हैं?
क्या 22 साल से एक ही जगह जमे इन अफसरों की बेहिसाब संपत्ति की जांच होगी?
क्या मंत्रालय के दबाव को दरकिनार कर कलेक्टर अपनी प्रशासनिक शक्ति का उपयोग करेंगे?
भूमि अभिलेख विभाग में चल रहे इस ‘मलाई मारो’ सिंडिकेट का अंत कब होगा?
यह सिर्फ तबादले का मुद्दा नहीं है, बल्कि सिस्टम के सड़ चुके हिस्से का पर्दाफाश है। अगर नियमों की बलि इसी तरह चढ़ती रही, तो आम आदमी का प्रशासन से भरोसा उठ जाएगा। वक्त आ गया है कि इन ‘कुर्सी कुमारों’ को बेनकाब किया जाए और सिस्टम की सफाई की जाए। अब देखना यह है कि इस ‘धमाके’ के बाद कलेक्ट्रेट की नींद खुलती है या फिर मंत्रालय की ‘मेहरबानी’ जारी रहती है।