देश के अनेक शहरों में हर वर्ष मानसून के दौरान किसी न किसी जर्जर इमारत के ढहने की खबर सामने आती है। हाल के वर्षों में मुंबई, ठाणे, भिवंडी, पुणे, कोलकाता, दिल्ली और अन्य महानगरों में हुए ऐसे हादसों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, भवन रखरखाव और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है। दुखद यह है कि अधिकांश मामलों में दुर्घटना के बाद राहत और बचाव कार्य तो तेजी से शुरू हो जाते हैं, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक सुधार अपेक्षित गति से लागू नहीं हो पाते।
भारत में तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के कारण आवास की मांग लगातार बढ़ी है। कई पुराने भवन दशकों पहले बने थे, जिनकी संरचनात्मक आयु अब समाप्ति की ओर है। समय के साथ निर्माण सामग्री कमजोर होती है, मरम्मत की आवश्यकता बढ़ती है और यदि नियमित निरीक्षण नहीं किया जाए तो भवन रहने योग्य नहीं रह जाते। इसके बावजूद आर्थिक मजबूरियों, वैकल्पिक आवास की कमी और पुनर्विकास परियोजनाओं में देरी के कारण अनेक परिवार ऐसे भवनों में रहने को विवश रहते हैं।
कई नगर निकाय समय-समय पर जर्जर या खतरनाक इमारतों की सूची जारी करते हैं और निवासियों को भवन खाली करने के नोटिस भी देते हैं। लेकिन केवल नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। जब तक प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, अस्थायी आवास और सुरक्षित विकल्प की प्रभावी व्यवस्था नहीं होगी, तब तक लोगों के लिए अपने घर छोड़ना आसान नहीं होगा। यही कारण है कि चेतावनियों के बावजूद अनेक लोग जोखिम उठाकर उन्हीं इमारतों में रहना जारी रखते हैं।
इस समस्या का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भवनों के रखरखाव से जुड़ा है। कई आवासीय सोसायटियों में समय पर मरम्मत, संरचनात्मक ऑडिट और आवश्यक तकनीकी जांच पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कभी आर्थिक संसाधनों की कमी, कभी मालिकों के बीच सहमति का अभाव और कभी कानूनी विवादों के कारण आवश्यक मरम्मत वर्षों तक टलती रहती है। परिणामस्वरूप छोटी-छोटी संरचनात्मक समस्याएं समय के साथ बड़े खतरे का रूप ले लेती हैं।
प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। नगर नियोजन, भवन निरीक्षण और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना स्थानीय निकायों का दायित्व है। यदि किसी भवन को खतरनाक घोषित किया गया है, तो उसके बाद केवल औपचारिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। नियमित निगरानी, समयबद्ध पुनर्विकास प्रक्रिया, आवश्यक कानूनी कार्रवाई और प्रभावित नागरिकों के लिए व्यवहारिक समाधान समान रूप से आवश्यक हैं। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नए निर्माण निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हों और निर्माण प्रक्रिया में किसी प्रकार की लापरवाही न हो।
जलवायु परिवर्तन भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, लंबे समय तक नमी, जलभराव और बदलते मौसम के कारण पुराने भवनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। हालांकि केवल बारिश को दुर्घटनाओं का कारण मानना उचित नहीं होगा। यदि भवन का रखरखाव समय पर किया जाए और उसकी संरचनात्मक स्थिति नियमित रूप से जांची जाए, तो कई दुर्घटनाओं की संभावना कम की जा सकती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए तकनीक का उपयोग भी प्रभावी साबित हो सकता है। आधुनिक संरचनात्मक ऑडिट, ड्रोन सर्वेक्षण, डिजिटल भवन अभिलेख, सेंसर आधारित निगरानी और समयबद्ध निरीक्षण प्रणाली स्थानीय प्रशासन को जोखिम वाले भवनों की पहचान करने में सहायता दे सकती है। इसके साथ ही नागरिकों को भी भवन सुरक्षा के प्रति जागरूक करना आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार की दरार, झुकाव या अन्य संकेतों को समय रहते संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया जा सके।
पुनर्विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता और गति लाना भी समय की मांग है। कई शहरों में पुराने भवनों का पुनर्विकास वर्षों तक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटका रहता है। यदि स्वीकृति प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध हो, तो जर्जर भवनों के स्थान पर सुरक्षित और आधुनिक आवास विकसित किए जा सकते हैं। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष सहायता योजनाएं भी आवश्यक हैं, ताकि सुरक्षा और आजीविका के बीच कठिन विकल्प चुनने की नौबत न आए।
भवन सुरक्षा केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। भवन मालिकों, आवासीय समितियों, इंजीनियरों, वास्तुकारों और नागरिकों की भी समान भूमिका है। नियमित रखरखाव, समय पर तकनीकी जांच, नियमों का पालन और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना अनेक दुर्घटनाओं को टाल सकती है। सुरक्षा संबंधी निर्देशों को केवल औपचारिकता न मानकर जीवन की रक्षा का माध्यम समझना होगा।
हर भवन हादसा कई परिवारों के सपनों, आजीविका और भविष्य को प्रभावित करता है। किसी दुर्घटना के बाद राहत और मुआवजा आवश्यक अवश्य हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना। इसके लिए दीर्घकालिक नीति, प्रभावी प्रशासन, समयबद्ध पुनर्विकास, सख्त सुरक्षा मानकों और नागरिक सहयोग की आवश्यकता है। यदि चेतावनियों को समय रहते गंभीरता से लिया जाए और सभी पक्ष अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करें, तो अनेक बहुमूल्य जीवन बचाए जा सकते हैं। सुरक्षित शहरों का निर्माण केवल आधुनिक इमारतों से नहीं, बल्कि जिम्मेदार शासन, जागरूक नागरिकों और सतत शहरी नियोजन से संभव होगा।





