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राम मंदिर ट्रस्ट की आज की बैठक पर टिकी सबकी निगाहें

अयोध्या :- अयोध्या में 6 जुलाई यानी आज होने वाली श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की त्रैमासिक बैठक सामान्य प्रशासनिक बैठक नहीं रह गई है। राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच, आठ आरोपियों की गिरफ्तारी, महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे, ट्रस्ट के पुनर्गठन की चर्चा तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त करने के प्रस्ताव ने इस बैठक को पिछले पांच वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण बैठक बना दिया है।

जानकारी के अनुसार बैठक में सबसे पहले चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के मामले पर चर्चा होगी। दोनों ने डोनेशन विवाद के बाद नैतिक आधार पर अपने पद छोड़ने की इच्छा जताई थी। हालांकि, ट्रस्ट के भीतर इस बात पर मतभेद है कि क्या उन्होंने विधिवत इस्तीफा दिया है या केवल पद छोड़ने की इच्छा व्यक्त की थी। इसी कारण बैठक में पहले उनके स्पष्टीकरण और उसके बाद आगे की कार्रवाई पर विचार होने की संभावना है।

जानकारी के अनुसार दोनों को कारण बताओ नोटिस (शो कॉज नोटिस) जारी किया जाएगा। उनसे लिखित और मौखिक स्पष्टीकरण लिया जाएगा। ट्रस्ट के बायलॉज के अनुसार किसी भी पदाधिकारी के खिलाफ बिना उसका पक्ष सुने कार्रवाई नहीं की जा सकती। पहले नोटिस, फिर जवाब और उसके बाद ही अंतिम निर्णय लेने की व्यवस्था है। यदि ट्रस्ट इस्तीफा स्वीकार करता है अथवा उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव आता है तो उस पर भी निर्धारित बहुमत से फैसला करना होगा। यानी किसी भी निर्णय से पहले पूरी प्रक्रिया का पालन आवश्यक होगा।

फैसला केवल ट्रस्ट के हाथ में

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट किसी भी सरकारी विभाग के अधीन नहीं है। यही वजह है कि चंपत राय या अनिल मिश्रा के भविष्य का फैसला न केंद्र सरकार कर सकती है और न उत्तर प्रदेश सरकार। यह अधिकार केवल ट्रस्ट के स्थायी ट्रस्टियों के पास है। गृह मंत्रालय ने पिछले वर्ष केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) को स्पष्ट रूप से बताया था कि ट्रस्ट के सभी निर्णय उसके सदस्य आंतरिक रूप से लेते हैं और केंद्र सरकार का उसके प्रशासनिक फैसलों में कोई दखल नहीं है।

यह विवाद तब सामने आया जब आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा ने केंद्र सरकार से ट्रस्ट के लिए लोक सूचना अधिकारियों (पीआईओ) का विवरण मांगा था। गृह मंत्रालय ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। अदालत के निर्देश पर केंद्रीय सूचना आयोग ने गृह मंत्रालय से विस्तृत जवाब मांगा। गृह मंत्रालय ने आयोग को बताया कि ट्रस्ट का गठन सर्वोच्च न्यायालय के नवंबर 2019 के निर्णय के अनुसार किया गया है। इसे न केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है और न ही किसी प्रकार का प्रशासनिक नियंत्रण है।

आयोग ने अपने अंतिम आदेश में माना कि ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है और इसे सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना जा सकता। यानी ट्रस्ट के निर्णयों की जवाबदेही उसके अपने संविधान और बायलॉज तक सीमित है। यही कारण है कि यदि चंपत राय या अनिल मिश्रा को हटाना है तो इसका निर्णय केवल ट्रस्ट के भीतर ही लिया जा सकता है। किसी बाहरी एजेंसी के पास ऐसा अधिकार नहीं है।

बहुमत जुटाना सबसे बड़ी चुनौती

6 जुलाई की बैठक का एक और महत्वपूर्ण पहलू ट्रस्ट के भीतर मौजूद वोटिंग व्यवस्था है। कागजों पर ट्रस्ट में 15 सदस्य हैं लेकिन वास्तविक स्थिति कहीं अधिक जटिल है। चार पदेन सरकारी सदस्य मतदान नहीं कर सकते। इनमें केंद्र सरकार के प्रतिनिधि गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, अयोध्या के जिलाधिकारी और निर्माण समिति के अध्यक्ष शामिल हैं। इनके अलावा एक ट्रस्टी का निधन हो चुका है जिससे प्रभावी मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या और घट गई है।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा, जिनके भविष्य पर चर्चा होनी है, अभी भी ट्रस्ट के सदस्य हैं और बैठक में शामिल होने के पात्र हैं। ऐसी स्थिति में बाकी स्थाई ट्रस्टियों के बीच व्यापक सहमति बनाना आवश्यक होगा। जानकारी के अनुसार यदि किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर निर्णय लेना है तो शेष सदस्यों में कम से कम छह लोगों की सहमति आवश्यक होगी। इसलिए केवल आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचना आसान नहीं होगा। ट्रस्ट के कामकाज को करीब से देखने वाले एक वकील बताते हैं कि यदि चंपत राय महासचिव का पद छोड़ भी देते हैं तो भी वे ट्रस्ट के सदस्य बने रह सकते हैं। इसी तरह डॉ. अनिल मिश्रा प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो सकते हैं लेकिन उनकी सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होगी। अब तक ट्रस्ट के भीतर किसी सदस्य को निष्कासित करने की स्पष्ट प्रक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए व्यावहारिक रूप से इस्तीफा ही सदस्यता समाप्त होने का सबसे प्रमुख रास्ता माना जाता है।

बैठक में जो सदस्य व्यक्तिगत रूप से अयोध्या नहीं पहुंच पाएंगे, उनके लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की व्यवस्था भी रहेगी। ट्रस्ट का आईटी सेल पहले से ही सभी सदस्यों को ऑनलाइन भागीदारी का विकल्प उपलब्ध कराता है।

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