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भोसलेकालीन ‘बावड़ी’ गिन रही अंतिम सांसें

– धंसी दीवारें, कचरे और काई का साम्राज्य, प्रशासन कब जागेगा?

नागपुर :- शहर की ऐतिहासिक जल प्रबंधन प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाने वाली भोसलेकालीन सोनेगांव तालाब से जुड़ी आमराई क्षेत्र की प्राचीन बावड़ी आज बदहाली का शिकार होकर अस्तित्व संकट से जूझ रही है। यह केवल एक बावड़ी की दुर्दशा नहीं, बल्कि भोसलेकालीन संपूर्ण जल प्रबंधन व्यवस्था के धीरे-धीरे समाप्त होने का संकेत भी है।

बावड़ी का एक हिस्सा धंस चुका है, जबकि उसके पत्थर के किनारे (कठड़े) जर्जर हो चुके हैं। अंदर कचरे का अंबार लगा है और पूरी संरचना पर काई की मोटी परत जम गई है। तालाब और बावड़ी को जोड़ने वाले प्राचीन भूमिगत जलमार्ग भी पूरी तरह बंद हो चुके हैं, जिससे ऐतिहासिक जल प्रणाली निष्क्रिय हो गई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, प्रशासन द्वारा बावड़ी पर लोहे के भारी एंगल रखे गए थे। इन्हीं के अत्याधिक वजन के कारण बावड़ी का एक हिस्सा धंस गया। अब पूरी संरचना खतरे की स्थिति में है। यदि समय रहते संरक्षण कार्य नहीं किया गया तो पूरी बावड़ी ढहने की आशंका है। इतिहास प्रेमियों और नागरिकों का कहना है कि क्या प्रशासन इस ऐतिहासिक धरोहर के पूरी तरह नष्ट होने का इंतजार कर रहा है?

सिर्फ सफाई नहीं, पूरी जल व्यवस्था का पुनर्जीवन जरूरी:

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कचरा हटाने या रंग-रोगन करने से इस धरोहर का संरक्षण संभव नहीं है। भोसलेकालीन जल प्रबंधन प्रणाली का वैज्ञानिक अध्ययन कर तालाब, बावड़ी, पत्थर के जलाशयों, भूमिगत जलमार्गों और पूरे जलग्रहण क्षेत्र का समग्र संरक्षण किया जाना आवश्यक है। अन्यथा नागपुर की ऐतिहासिक जल विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है।

250 साल पुरानी जल विरासत

करीब ढाई सौ वर्ष पुरानी यह बावड़ी तत्कालीन जल प्रबंधन प्रणाली का जीवंत प्रमाण है। यदि इसका संरक्षण नहीं किया गया तो केवल एक ऐतिहासिक संरचना ही नहीं, बल्कि उस दौर की वैज्ञानिक जल व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी। ‘बारव बचाव समिति’ के हितेश डफ का कहना है कि प्रशासन को केवल अस्थायी मरम्मत करने के बजाय तत्काल संरक्षण और संवर्धन का व्यापक अभियान चलाना चाहिए। साथ ही पुरातत्व विभाग इस पूरे क्षेत्र को पर्यटन स्थल का दर्जा देकर इसकी ऐतिहासिक पहचान सुरक्षित करे।

ऐसी थी भोसलेकालीन जल प्रबंधन प्रणाली :

करीब ढाई सौ वर्ष पहले श्रीमंत राजे मुधोजी महाराज भोसले (द्वितीय) के शासनकाल में सोनेगांव तालाब का निर्माण कराया गया था। पत्थरों से बनी मजबूत तटबंदी वाला यह तालाब और उससे जुड़ी बावड़ी उस समय की उन्नत जल प्रबंधन तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, तालाब का पानी वैज्ञानिक ढंग से भूमिगत जलमार्गों और पत्थर की जलवाहिनियों के माध्यम से पहले बावड़ी और फिर कुंडों तक पहुंचाया जाता था।

सोनेगांव तालाब की तीन दिशाओं में मजबूत तटबंदी बनाई गई थी, जबकि पीछे की ओर से पोहरा नदी का पानी तालाब में आता था। तालाब भरने के बाद तटबंदी में बने विशेष छिद्रों से पानी पत्थर के टैंकों में पहुंचता था। वहां से भूमिगत ढलानदार मार्गों के जरिए पानी बावड़ी तक लाया जाता और फिर आगे कुंडों में पहुंचाकर उपयोग किया जाता था। यह व्यवस्था उस समय की उन्नत जल संरक्षण और जल वितरण प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।

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