– 13 लोगों को तुरंत रिहा करने का दिया आदेश
नागपुर :- एमपीडीए के तहत पुलिस द्वारा जारी किए गए डिटेंशन के आदेश को चुनौती देते हुए सुरेश मनवर और अन्य 12 की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई. इस पर लंबी बहस के बाद न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का हवाला देते हुए ‘महाराष्ट्र खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1981′ (एमपीडीए) के तहत जारी किए गए हिरासत (डिटेंशन) आदेशों को रद्द कर दिया. साथ हो 13 याचिकाकर्ताओं को तुरंत रिहा करने का आदेश भी जारी किया.
बिना दिमाग लगाए जारी किए गए आदेश: हाई कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने हिरासत के आदेश जारी करते समय उचित कारणों का उल्लेख नहीं किया. अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि राज्य सरकार ने पूरे महाराष्ट्र की परिस्थितियों को एक समान मान लिया, जो कि तथ्यों के प्रति दिमाग का इस्तेमाल न करने को दर्शाता है. कोर्ट के अनुसार, यह दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है.
इस मामले में अदालत ने अक्षय भास्कर सहारे बनाम महाराष्ट्र राज्य’ के पिछले फैसले का उल्लेख किया, जिसमें समान आधारों पर हिरासत आदेशों को रद्द किया गया था. इस फैसले को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने 21 नवंबर, 2025 को पहले ही खारिज कर दिया था. अदालत ने सुरेश तुकाराम मनवर, राजू भोजू पवार, गजानन अशोक दहाले, मनोज चैत्रम चिमनकर, संकेत दिलीप कानेरे, और नम्रता नीलेश नीले सहित कुल 13 लोगों की रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया. कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि इन व्यक्तियों की किसी अन्य मामले में आवश्यकता नहीं है, तो इन्हें तत्काल रिहा किया जाए.
प्रक्रियात्मक खामियों पर उठाए सवाल
अदालत ने पाया कि हिरासत की पुष्टि करने वाले आदेश (धारा 12 के तहत) न केवल बिना किसी ठोस कारण के पारित किए गए थे, बल्कि उन्हें सक्षम अधिकारी के बजाय एक अनुभाग अधिकारी द्वारा संप्रेषित किया गया था, जो कि नियमों के विरुद्ध है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि धारा 3 के तहत शक्तियों का प्रदान करना ही अवैध पाया जाता है, तो हिरासत का पूरा आदेश शुरुआत से ही शून्य माना जाएगा.




