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सीसीएमबी का खुलासा, बाघों में उभर रही मानव-जैसी बीमारियों के संकेत

नागपुर :-बाघ अभयारण्यों के आसपास मानव उपस्थिति और मानवीय संगति बाघों के पाचन तंत्र में मौजूद अरबों जीवाणुओं की संरचना को बदल रही है। यह निष्कर्ष हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) द्वारा किए गए एक अध्ययन से सामने आया है।

सीसीएमबी के शोधकर्ताओं ने दो वर्षों की अवधि में देश के पाँच प्रमुख अभयारण्यों – उत्तराखंड में कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व, मध्य प्रदेश में कान्हा और बांधवगढ़, महाराष्ट्र में ताडोबा-अंधारी और केरल में पेरियार – से बाघों के मल का विश्लेषण किया। इसमें उन्होंने पाया कि बाघों पर मानव उपस्थिति और मानवीय संगति का प्रभाव चिंताजनक है। बाघों के लिए आंत के जीवाणु बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि ये भोजन पचाने, पोषक तत्वों को अवशोषित करने, प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने और संक्रमणों से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि ये जीवाणु असंतुलित हो जाते हैं, तो इस प्रजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। अध्ययन में पाया गया कि टोल्यूनि, स्टाइरीन, बिस्फेनॉल और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन सहित विषैले रसायनों को तोड़ने में सक्षम बैक्टीरिया, मानव हस्तक्षेप वाले क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाए गए।

यह विशेष रूप से ताड़ोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व में सच है, जो खुले गड्ढे वाली कोयला खदानों और ताप विद्युत संयंत्रों के पास स्थित है। बाघ की आंत में मौजूद बैक्टीरिया पर्यावरणीय प्रदूषकों के अनुकूल हो रहे हैं। लेकिन इसके परिणाम दूरगामी हैं। बैक्टीरिया समुदायों में महत्वपूर्ण मौसमी परिवर्तन भी देखे गए। जलवायु परिवर्तन ने शिकार की उपलब्धता, आहार संरचना और तनाव के स्तर को बदल दिया है। अध्ययन में एक और चिंताजनक तथ्य भी सामने आया। जब शोधकर्ताओं ने विश्लेषण किया कि ये बैक्टीरिया समुदाय क्या करने में सक्षम हैं, तो उन्होंने पाया कि इनमें मधुमेह और अल्जाइमर जैसी बीमारियाँ शामिल हैं


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