– जंगल उजड़ा, वन परियोजना अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
यासीन शेख गोंदिया :- सड़क अर्जुनी तहसील अंतर्गत उमरझरी मुख्य नहर का निर्माण कार्य चिरचाड़ी ग्राम पंचायत तक लगभग सात किलोमीटर तक जारी है। यह कार्य पाटबंधारे (सिंचाई) विभाग के अंतर्गत एक ठेकेदार द्वारा अक्टूबर 2025 से किया जा रहा है। नहर निर्माण में हजारों ब्रास रेत का उपयोग किया जा रहा है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस नहर निर्माण में प्रयुक्त रेत पूरी तरह अवैध है, जिसका उत्खनन एफ.डी.सी.एम. वन परियोजना, गोंदिया के अंतर्गत आने वाले नालों से योजनाबद्ध तरीके से किया गया। स्थानीय नागरिकों और वन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यह अवैध रेत उत्खनन कोई एक-दो दिन का नहीं, बल्कि पिछले तीन से चार महीनों से लगातार चल रहा है, जो बिना ऊपरी संरक्षण के संभव नहीं माना जा रहा।
क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि चूंकि नहर निर्माण कार्य पाटबंधारे विभाग से जुड़ा है, इसलिए वन परियोजना के अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंदे रखीं। चिरचाड़ी से उमरझरी तक पूरे सात किलोमीटर लंबे मार्ग पर रात-बेरात टिप्परों की आवाजाही और दिन में पोकलेन मशीनों द्वारा नालों से रेत निकालने का कार्य खुलेआम होता रहा। ऐसे में अधिकारियों द्वारा “जानकारी न होने” का तर्क अविश्वसनीय प्रतीत होता है।

स्थानीय ग्रामीणों ने यह भी पुष्टि की है कि नहर से सटे वन परियोजना क्षेत्र में सैकड़ों पेड़ों को जड़ समेत उखाड़कर फेंक दिया गया है। चर्चा यह भी है कि इस कटाई से प्राप्त लकड़ी का कोई रिकॉर्ड विभागीय दस्तावेजों में दर्ज नहीं है, जिससे सरकारी संपत्ति की लूट की आशंका और गहराती जा रही है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि मामले के उजागर होने के बाद कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों को आगे कर वास्तविक जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, पर्यावरण प्रेमियों और पत्रकार संगठनों द्वारा मामले को लगातार उठाए जाने से उच्चस्तरीय जांच की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
‘हाथी निकल जाने के बाद पूंछ पकड़ने’ जैसा मामला
क्षेत्र में आम सवाल यह है कि जब वन परिक्षेत्र अधिकारी, उपविभागीय वन अधिकारी और बीट गार्ड का नियमित भ्रमण होता है, तो फिर तीन महीनों तक यह अवैध गतिविधि कैसे चलती रही? इसी कारण आम नागरिक इस पूरे प्रकरण को “हाथी निकल जाने के बाद पूंछ पकड़ने” जैसा मामला बता रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों द्वारा इस पूरे मामले में कठोर कार्रवाई की मांग की जा रही है। लोगों का कहना है कि यदि इस तरह के गंभीर पर्यावरणीय अपराधों पर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो अवैध रेत उत्खनन और जंगल विनाश जैसी गतिविधियों को खुला संरक्षण मिलता रहेगा। जनता ने मांग की है कि दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ तत्काल आपराधिक कार्रवाई की जाए तथा हुए नुकसान की भरपाई उन्हीं से कराई जाए।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है या वास्तव में दोषी अधिकारियों और ठेकेदार पर निलंबन, एफआईआर दर्ज करने तथा पर्यावरण क्षति की भरपाई जैसी ठोस कार्रवाई होती है।




