अश्विन नवरात्र का शुभारंभ एक बार फिर से स्त्री-शक्ति की उपासना का संदेश लेकर आया है। नौ दिनों तक देवी के विविध रूपों की आराधना केवल धार्मिक आस्था का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक चेतना का भी उत्सव है जो स्त्री के भीतर छिपी शक्ति और सामर्थ्य को पहचानने की प्रेरणा देता है।
स्त्री असमान नहीं, असामान्य है
समाज की विडंबना यह है कि आज भी स्त्री को बराबरी के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जबकि सच यही है कि स्त्री असमान नहीं, बल्कि असामान्य है। वह त्याग, सृजन और सहनशीलता की धुरी है। पुरुष श्रेष्ठ न होते हुए भी अपने को श्रेष्ठ मान बैठता है, और यही स्त्री का दुर्भाग्य है कि वह इसे स्वीकार कर लेती है।
वास्तव में पुरुष तो मानव जीवन में मात्र एक बीज रूप है। उसके बिना सृष्टि अधूरी है, लेकिन स्त्री के बिना तो वह मानो तूफानी समुद्र में बिना पतवार की नाव की तरह है।
नवरात्र : शक्ति का आत्मबोध
नवरात्र का पर्व हमें यह सिखाता है कि शक्ति कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्त्री के भीतर ही छिपी है। माँ दुर्गा के नौ रूप स्त्री को यह स्मरण कराते हैं कि उसे समानता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पुरुष स्वयं उसके बिना अधूरा है। जिस पुरुष को वह श्रेष्ठ मानती है, वह तो उसकी गोद में पलकर ही श्रेष्ठ कहलाता है।
समाज और राजनीति में स्त्री की भूमिका
आज महिला आरक्षण बिल से लेकर राजनीति, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी चर्चा का विषय है। पंचायतों से लेकर संसद तक अब महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है। परंतु यह संघर्ष का परिणाम है, स्वाभाविक मान्यता का नहीं। नवरात्र का संदेश यही है कि यह मान्यता बाहर से नहीं मिलेगी, बल्कि स्त्री को स्वयं अपनी शक्ति को स्वीकार करना होगा।
समानता नहीं, आत्म-विश्वास की जरूरत
बराबरी का प्रश्न तभी तक बना रहेगा जब तक स्त्री खुद को साबित करने में अपनी ऊर्जा खर्च करती रहेगी। जिस दिन वह अपने सामर्थ्य को पहचान लेगी, उस दिन यह प्रश्न ही बेमानी लगेगा कि कौन किससे बड़ा है।
स्त्री और पुरुष दो नहीं, बल्कि एक ही धारा हैं। जैसे नदी और उसका किनारा एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। बराबरी की गैरवाजिब माँग करते-करते स्त्री भूल जाती है कि पुरुष तो उसके बिना भी मोहताज है।
इतिहास और परंपरा से प्रेरणा
हमारे इतिहास और परंपरा में स्त्री-शक्ति की पूजा का उदाहरण अनगिनत हैं। काली, दुर्गा और सरस्वती जैसे आदर्श केवल देवी स्वरूप ही नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक संदेश भी हैं कि ज्ञान, शक्ति और समृद्धि का मूल स्त्री है। छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जिन्होंने मातृत्व को राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बना दिया।
अपनी, मान्यता अपनी
समानता का शोर पुरुष ने कभी नहीं मचाया, क्योंकि वह जानता है कि बिना स्त्री के वह आधा ही है। फिर भी स्त्री बार-बार खुद को सिद्ध करने की कोशिश करती है, मानो सूरज को रोज़ उजाला दिखाती हो। अगर सचमुच तराजू पर तौल हो, तो झुकाव हमेशा स्त्री की ओर ही होगा।
नवरात्र का यह पर्व हमें यही सिखाता है कि स्त्री-शक्ति को न बराबरी सिद्ध करने की आवश्यकता है और न किसी से मान्यता लेने की। उसकी ऊर्जा, उसका त्याग और उसका सृजन ही उसकी अमर पहचान हैं।
– डॉ. प्रवीण डबली,वरिष्ठ पत्रकार




