नागपूर :- आज के आधुनिक परिवारों में बच्चों की परवरिश का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां संयुक्त परिवारों में बच्चा पूरे घर की देखरेख और अनुशासन में बड़ा होता था, वहीं अब न्यूक्लियर फैमिली में उसका दायरा सिमटकर केवल मां-बाप तक रह गया है। इस बदलाव का सीधा असर बच्चों के स्वभाव, उनकी मानसिकता और सबसे बढ़कर उनकी एकाग्रता क्षमता पर पड़ रहा है।
बदलते पारिवारिक ढांचे का असर
संयुक्त परिवारों में बच्चा सिर्फ मां-बाप का नहीं, बल्कि पूरे घर का होता था। दादी की डांट, ताई की सीख, चाचा का अनुशासन और मामा का मज़ाक – यह सब मिलकर बच्चे को गढ़ते थे।
आज न्यूक्लियर फैमिली में बच्चा केवल दो लोगों की जिम्मेदारी बनकर रह गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, भारत में अब शहरी परिवारों में 60% से अधिक घरों में केवल एक या दो बच्चे हैं। इसका असर बच्चों के सामाजिकीकरण और धैर्य पर स्पष्ट दिखता है।
लाड़-प्यार और ‘ओवर अटेंशन’ की समस्या
कम बच्चे होने के कारण मां-बाप अक्सर बच्चों को ब्रह्मांड का केंद्र बना देते हैं। हर मांग पूरी करना, हर छोटी उपलब्धि पर “वाह-वाह बेटा” कहना, या सोशल मीडिया पर उसकी हर सफलता को प्रदर्शित करना – यह सब बच्चे को वास्तविकता से दूर ले जाता है।
इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री (2022) की एक रिपोर्ट के अनुसार, शहरी भारत के लगभग 35% बच्चे ध्यान भंग और मूड स्विंग्स जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
धीरे-धीरे बच्चा यह मानने लगता है कि उसका मूल्य केवल तालियों, अवॉर्ड्स और तारीफों से है।
स्कूल और घर के बीच का अंतर
घर में जहां सब कुछ उसकी मर्ज़ी से होता है, वहीं स्कूल में उसे तुलना, प्रतियोगिता, भेदभाव और अनुशासन का सामना करना पड़ता है। इस विरोधाभास को समझ पाना अकेले बच्चों के लिए कठिन होता है। यूनिसेफ की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 10 में से 6 बच्चे स्कूल में मानसिक दबाव और असमानता का अनुभव करते हैं।
सही संस्कार और अनुशासन ही समाधान
यह मानना गलत होगा कि अकेला बच्चा जन्म से ही बिगड़ा या कमजोर होता है। असल में, वह भी उतना ही सक्षम और प्रतिभाशाली होता है जितना दो या तीन बच्चों वाले परिवार का बच्चा। फर्क सिर्फ परवरिश का है।
अगर मां-बाप सही संस्कार, अनुशासन और थोड़ी सख्ती के साथ परवरिश करें, तो अकेला बच्चा और भी स्वतंत्र, सहनशील और आत्मनिर्भर बन सकता है।
शोपीस नहीं, इंसान मानें बच्चे को
आज का बड़ा संकट यह है कि हम बच्चे को इंसान कम और ‘डिस्प्ले पीस’ ज्यादा समझने लगे हैं। उसकी सफलता को अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं का प्रोजेक्ट बना देते हैं।
बच्चा असल में शोपीस या परिवार का “गर्व टैग” नहीं, बल्कि अपनी किस्मत और राह लेकर आया एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है।
आज की पीढ़ी के बच्चों में एकाग्रता की कमी केवल उनकी गलती नहीं, बल्कि बदलते पारिवारिक ढांचे और परवरिश की शैली का परिणाम है। संयुक्त परिवारों जैसी विविध सीख और अनुशासन अब दुर्लभ हैं, लेकिन अगर छोटे परिवारों में भी सही मार्गदर्शन, संतुलित प्यार और अनुशासन का समन्वय हो, तो आने वाली पीढ़ी और भी बेहतर बन सकती है।
बच्चों को “स्टार परफॉर्मर” या “परिवार का गर्व” बनाने से ज्यादा जरूरी है उन्हें सजग, सहनशील और आत्मनिर्भर इंसान बनाना।
– युगेश्वरी प्रवीण डबली,प्राध्यापक, हिंदी विभाग
दयानंद आर्य कन्या महाविद्यालय,नागपुर.




