– नागपुर बना विपक्ष की नाकामी का आईना : शहरी राजनीति में पहचान बनाम संगठन की जंग
– नागपुर मनपा में ‘भगवा शतक’ का रहस्य ! – क्यों और कैसे जीती भाजपा? क्यों बिखरा विपक्ष?
प्रगति मिश्रा,नागपुर :- नागपुर महानगरपालिका चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि महाराष्ट्र की उपराजधानी कहलाने वाला यह महानगर अब केवल संघ-भाजपा का गढ़ नहीं, बल्कि विपक्ष की राजनीतिक अक्षमता का प्रयोगशाला मॉडल बन चुका है। लगातार दूसरी बार भाजपा ने यहां शिंदे-सेना के साथ मिलकर 102 पार्षदों को जितवाकर शतक न केवल ठोंका, बल्कि लगातार चौथी बार नागपुर महानगरपालिका की सत्ता पर काबिज होकर यह संदेश दे दिया कि यहां चुनाव चेहरे से नहीं,… संगठन, रणनीति और गणित से जीते जाते हैं!
दरअसल, नागपुर में भाजपा की जीत के चार निर्णायक कारण रहे हैं… उनमें पहला और सबसे बड़ा कारण रहा —मजबूत कैडर और वार्ड-स्तरीय माइक्रो-प्लानिंग! नागपुर में भाजपा ने हर प्रभाग को अलग इकाई मानकर रणनीति बनाई। उम्मीदवार चयन में स्थानीय पहचान, जातीय-सामाजिक संतुलन और व्यक्तिगत नेटवर्क को प्राथमिकता दी गई।
दूसरा बड़ा फैक्टर रहा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का प्रभाव। नागपुर उनकी जन्मभूमि और राजनीतिक कर्मभूमि है… फिर भले ही यह चुनाव उनके नाम पर नहीं लड़ा गया हो, लेकिन संगठन से लेकर रणनीति तक हर स्तर पर उनकी छाप साफ दिखी। कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दिया गया कि यह चुनाव ‘अपना’ है। इसी कारण देवा भाऊ ‘धुरंधर’ बन गए।
तीसरा कारण रहा विपक्ष का बिखराव…! कांग्रेस, राकांपा और अन्य दलों का कोई साझा नैरेटिव नहीं था।भाजपा ने इस बिखराव को वोटों में तब्दील कर लिया।
चौथा और निर्णायक कारण रहा… स्थिर प्रशासन की छवि! सड़क, पानी, सफाई और बुनियादी सुविधाओं पर भाजपा ने अपने पिछले कार्यकाल के काम को प्रचार का हथियार बनाया और यह दांव सफल रहा।
अब सवाल है कि कांग्रेस की हार क्यों हुई? दरअसल, नागपुर में कांग्रेस 33 सीटों पर सिमट गई। उसकी हार किसी एक कारण से नहीं, बल्कि लगातार की गई राजनीतिक भूलों का परिणाम है। पार्टी न तो मजबूत चेहरे सामने रख पाई, न ही संगठन को सक्रिय कर सकी। टिकट वितरण में गुटबाजी हावी रही, कई वार्डों में असंतुष्ट उम्मीदवारों ने अंदरूनी विरोध भी किया।
कांग्रेस का सबसे बड़ा नुकसान यह रहा कि वह न भाजपा-विरोध की ठोस लाइन बना पाई, न खुद को विकल्प के रूप में पेश कर सकी। शहरी मतदाता के मुद्दों पर पार्टी की चुप्पी और नेतृत्व की अनुपस्थिति ने उसे हाशिए पर धकेल दिया।
यह सवाल भी राजनीतिक गलियारों में पूछा जा रहा है की अससुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम का अचानक नागपुर में उभार कैसे हो गया? क्या उसने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध
6 नगरसेवकों को जीत दिला दी? यह जीत एमआईएम की मजबूती से ज्यादा कांग्रेस की कमजोरी का प्रमाण है। साफ है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक बिखर चुका है।
एमआईएम ने स्थानीय मुद्दों, पहचान की राजनीति और सीधी ज़मीनी पकड़ के दम पर कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि अल्पसंख्यक मतदाता अब ‘ कांग्रेस’ की राजनीति से बाहर निकल चुका है। इनके अलावा ‘मुस्लिम लीग’ के भी चार उम्मीदवार जीते। इन्होंने भी राजनीति का व्याकरण बदल दिया। यह सिर्फ चुनावी जुगाड़ से नहीं हुआ, बल्कि पहचान की राजनीति के बदले हुए समीकरण के संकेत है। यह प्रयोग बताता है कि मतदाता अब पार्टी से ज्यादा पहचान और स्थानीय प्रभाव को महत्व दे रहा है। यह भी सच है कि इन उम्मीदवारों को फायदा विपक्षी बिखराव और कांग्रेस-एमआईएम के वोट कटाव से मिला, जिससे भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ हुआ।
वहीं अजित व शरद पवार की एनसीपी तथा उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उबाठा) का जादू खत्म नजर आया।
इन तीनों की पार्टियों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। ये पार्टीयां न तो शहरी मतदाताओं से न संवाद कर पाई, न ही अपना कोई प्रभावशाली मुद्दा खड़ा कर सकी। पवार चाचा-भतीजे की राजनीतिक खींचतान और ठाकरे की कमजोर होती छवि ने उनके कार्यकर्ताओं को भ्रमित किया और मतदाता को दूर कर दिया। यह चुनाव साफ संकेत देता है कि राकांपा की राजनीति ग्रामीण महाराष्ट्र तक और उद्धव ठाकरे की सियासत मुंबई तक सिमटती जा रही है, और नागपुर समेत विदर्भ में उनका प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है।
जो ज़मीन पर नहीं है, वह कभी सत्ता में नहीं आ पाएगा!
कुल मिलाकर नागपुर महानगर, विपक्ष की नाकामी का आईना बन गया। नागपुर महानगरपालिका के नतीजे केवल भाजपा की प्रचंड जीत की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे विपक्ष की रणनीतिक दिवालियेपन की रिपोर्ट भी दर्शाते हैं। भाजपा ने संगठन, रणनीति और अनुशासन से चुनाव जीता, जबकि विपक्ष आपसी भ्रम, गुटबाजी और पहचान संकट में उलझा रहा। नागपुर ने साफ संदेश दे दिया है कि जो ज़मीन पर नहीं है, वह कभी सत्ता में नहीं आ पाएगा!








