– एक विकास के बाद दूसरा विकास हाथ में लेकर घूमे फावड़ा और टिकास!
– कैसे होगा विकास? “एक सड़क बनी वही दूसरी खुदाई शुरू”
कैसे होगा विकास, जब एक विकास पूरा भी नहीं होता और दूसरा विकास फावड़ा और टिकास लेकर उन्ही सड़कों पर घूमने लग जाता है? आज सड़क बनी, कल वही सड़क फिर खोद दी गई—कभी केबल के नाम पर, कभी पाइपलाइन के नाम पर, तो कभी किसी नए “फावड़ा और टिकास” के नाम पर।
आज नागपुर के नागरिकों के मन में एक गंभीर सवाल उठ रहा है यदि किसी सड़क हादसे में किसी की जान जाती है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जानी चाहिए? अब यह सवाल केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनता के आक्रोश का रूप ले चुका है।
शहर में “स्मार्ट सिटी”, “विकसित नागपुर” जैसे आकर्षक नारे और योजनाएँ तो खूब दिखाई देती हैं, लेकिन जब नागरिकों को सुरक्षित सड़कें तक उपलब्ध नहीं हो पा रही हों, तो यह विकास नहीं बल्कि विकास का दिखावा प्रतीत होता है।
आख़िर प्रशासन और शासन और कितने हादसों, और कितनी जानों का इंतज़ार कर रहे हैं?![]()
नागपुर में बनी सीमेंट सड़कें अब खुद एक बड़ा सवाल बन चुकी हैं।
बार-बार उनकी गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हैं और हर बार जवाब देते-देते केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी भी थकते नज़र आते हैं, क्योंकि जिस सोच और मानकों के साथ सीमेंट सड़कों की योजना बनाई गई थी, उसे ज़मीनी स्तर पर कुछ अधिकारियों की अनदेखी और कुछ ठेकेदारों की मालिकाना–मुनाफाखोरी व्यवस्था ने पूरी तरह बिगाड़ दिया। इन दिनों नागपुर में विकास के नाम पर सड़कों की खुदाई ज़ोरों पर है, लेकिन सड़कों का वास्तविक विकास कहीं दिखाई नहीं देता। पर्यायी मार्ग के नाम पर जनता की जान से खुला खिलवाड़ किया जा रहा है। शहर की लगभग 80 प्रतिशत सड़कें गड्ढों से भरी हुई हैं, और यह अब कोई अपवाद नहीं बल्कि नागपुर की आम और भयावह सच्चाई बन चुकी है।
विडंबना यह है कि जिन मार्गों से VVIP, मंत्री और बड़े अधिकारी आते-जाते हैं, वहीं विकास बड़ी फुर्ती से दौड़ता हुआ दिखाई देता है। यदि अधिकारी संतुष्ट हों, तो उन सड़कों पर डामर की परतें तुरंत बिछा दी जाती हैं, और यदि संतुष्टि न हो तो “बिल रुकने” का दर्द अचानक याद आ जाता है। ऊपर वालों की वाहवाही और बिल पास करवाना ही विकास का पैमाना बन गया है।
लेकिन आम जनता के हिस्से में सिर्फ गड्ढे, हादसे, चोटें और कई बार जान गंवाने की मजबूरी ही आती है। हाल ही में नागपुर में प्रतापनगर से जैताला के बीच, केबल डालने के लिए खोदे गए गड्ढे में गिरने से एक युवक की मौत की खबर सामने आई। इसके बावजूद प्रशासन टस से मस नहीं हुआ।
सवाल सीधा और स्पष्ट है
क्या आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं?
यदि यही हादसा किसी VVIP, मंत्री या उनके परिवार के सदस्य के साथ हुआ होता, तो संभवतः रातों-रात सड़कें एवेन्यू में तब्दील कर दी जातीं।लेकिन जब बात आम जनता की आती है, तो वही पुराना जवाब सुनने को मिलता है—“काम चल रहा है।”
अब सवाल यह नहीं है कि सड़क कब बनेगी,सवाल यह है कि और कितनी जानें जाएँगी?
कितने हाथ-पैर टूटेंगे?
कितनी ज़िंदगियाँ अपंग होंगी?
क्योंकि अधिकारियों की उदासीनता और सिस्टम की संवेदनहीनता के आगे,अब लगता है कि नागपुर की जनता के लिए सिर्फ भगवान ही मालिक है।