मुंबई :- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि यदि सामाजिक व्यवहार से जातिगत भेदभाव को समाप्त करना है, तो सबसे पहले जाति को मन से मिटाना होगा। उन्होंने कहा कि अतीत में जाति को पेशे और काम से जोड़ा जाता था, लेकिन बाद में इसने समाज में गहराई से जड़ें जमाई और यही जाति व्यवस्था भेदभाव का कारण बन गई।
उन्होंने यह भी कहा जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, देश ‘विश्वगुरु’ बना रहेगा। ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान दुनिया में कहीं और नहीं मिलता। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में यहां आयोजित जन संगोष्ठी में भागवत ने लोगों से जाति व्यवस्था को अपने मन से निकालने की अपील की।
उन्होंने कहा कि इस भेदभाव को समाप्त करने के लिए जाति को मन से मिटाना होगा। यदि ईमानदारी से ऐसा किया जाए तो 10 से 12 वर्षों के भीतर जातिगत भेदभाव समाप्त हो जाएगा। इस अवसर पर उन्होंने आम जनता के साथ संवाद भी किया। दर्शकों के सवालों का जवाब देते हुए भागवत ने कहा कि संघ का लक्ष्य समाज के साथ-साथ भारत को उसकी परम गौरव की ओर ले जाना है।
उन्होंने कहा कि संघ व्यक्तिगत चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के लिए काम करता है। यह प्रतिक्रिया से उत्पन्न संगठन नहीं है और न ही इसकी किसी के साथ प्रतिस्पर्धा है। उन्होंने कहा, ‘संघ स्वयं बड़ा नहीं बनना चाहता, वह समाज को बड़ा बनाना चाहता है।’ अगर लोग संघ को समझना चाहते हैं तो उन्हें इसकी शाखाओं में आना होगा।
धर्म ही संपूर्ण ब्रह्मांड का चालक है, सब कुछ इसी सिद्धांत पर चलता है
मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा, धर्म ही संपूर्ण ब्रह्मांड का चालक है और सब कुछ इसी सिद्धांत पर चलता है। भारत को अपने पूर्वजों से एक समृद्ध आध्यात्मिक विरासत प्राप्त हुई है और वह संतों एवं ऋषियों से निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त करता रहा है। जब तक ऐसा धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, तब तक यह ”विश्वगुरु” बना रहेगा।
दुनिया के पास इस प्रकार का ज्ञान नहीं है क्योंकि उसमें आध्यात्मिकता की कमी है। चाहे नरेन्द्र भाई हों, मैं, आप या कोई और, हम सभी को एक ही शक्ति चलाती है। अगर वाहन उस शक्ति से चलता है तो कभी कोई दुर्घटना नहीं होगी। वह शक्ति धर्म है। देश धर्मनिरपेक्ष हो सकता है, लेकिन कोई भी मनुष्य या कोई भी रचना धर्म से रहित नहीं हो सकती।