गरीबों की आख़िरी उम्मीद पर संकट : मेडिकल कॉलेज की कैंसर मशीन 10 साल से बदले जाने का इंतज़ार

0
52

– कागज़ों में इलाज, हकीकत में बदहाली, कोबाल्ट मशीन कभी भी हो सकती है ठप

– 100 से 30 मरीजों तक सिमटा इलाज, सरकारी लापरवाही से कैंसर पीड़ित बेहाल

– न्यायालय ने लिया संज्ञान: करोड़ों मंजूर, फिर भी अधूरी कैंसर सुविधाएं

नागपुर :- विदर्भ के गरीब और जरूरतमंद कैंसर मरीजों के लिए सहारा माना जाने वाला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज का कैंसर विभाग आज खुद गंभीर बदहाली के दौर से गुजर रहा है. प्रशासनिक अनदेखी के चलते कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली कोबाल्ट मशीन पिछले 10 वर्षों से अपने जरूरी ‘सोर्स’ (सोर्स) के बदले जाने का इंतजार कर रही है.

स्थिति इतनी विकट है कि यह मशीन कभी भी पूरी तरह ठप पड़ सकती है जिसका सीधा असर उन गरीब मरीजों पर पड़ेगा जो निजी अस्पतालों का महंगा इलाज वहन नहीं कर सकते. इस संदर्भ में छपी खबर पर स्वयं संज्ञान लेते हुए न्यायाधीश अनिल किल्लोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने जनहित के रूप में स्वीकार किया. साथ ही जनहित याचिका के रूप में प्रेषित करने के लिए अधि. अनूप गिल्डा को अदालत मित्र के रूप में नियुक्त किया. मरीजों की संख्या और इलाज की क्षमता में गिरावट के अनुसार यह राज्य की पहली कोबाल्ट मशीन थी जो 2006 में केंद्र सरकार के फंड से खरीदी गई थी. नियमानुसार, इस मशीन का मुख्य घटक यानी ‘सोर्स’ हर 5 साल में बदलना अनिवार्य होता है लेकिन आखिरी बार इसे 2015 में बदला गया था. मशीन की कार्यक्षमता 2020 में ही समाप्त हो चुकी है. इसके परिणामस्वरूप पहले जहां रोजाना 100 से अधिक मरीजों का इलाज होता था, अब केवल 30 से 40 मरीजों को ही थेरेपी दी जा पा रही है. रेडिएशन की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होने के कारण मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है. मशीन के बार-बार खराब होने से इलाज में बाधा आ रही है.

लीनियर एक्सेलेरेटर की खरीद भी अटकी, बढ़ी लागत

कैंसर के आधुनिक इलाज के लिए जरूरी ‘हाई एनर्जी लीनियर एक्सेलेरेटर’ मशीन की खरीद भी लंबे समय से लंबित है. इस यंत्र के लिए 2018 में सामाजिक न्याय और आदिवासी विकास विभाग की ओर से कुल 23.20 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे. हालांकि खरीद प्रक्रिया में हुए अत्यधिक विलंब के कारण अब इस मशीन की कीमत बढ़कर 35 करोड़ 82 लाख रुपये से अधिक हो गई है. सरकारी तंत्र की इस सुस्ती का खामियाजा उन मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जिनके पास मेडिकल अस्पताल के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है.