– सम्पत्ति की तरह हस्तांतरित नहीं की जा सकती बच्ची
नागपुर :- हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में 8 साल की बच्ची की कस्टडी मांगने वाले पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कार्पस) याचिका को खारिज कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्ची जन्म से ही अपने ननिहाल में है, इसलिए इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि बच्ची का कल्याण सर्वोपरि है और कस्टडी के मामलों को केवल संपत्ति की तरह हस्तांतरित नहीं किया जा सकता. याचिकाकर्ता सुनील परतेती का विवाह 4 मई 2017 को सुवर्णा सरेयाम के साथ हुआ था. 6 अप्रैल 2018 को उनकी एक बेटी का जन्म हुआ. वैवाहिक विवादों के कारण सुवर्णा अपनी बच्ची के साथ छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) स्थित अपने मायके में रहने लगी थीं जहां 19 जून 2020 को उनका निधन हो गया. इसके बाद सुनील ने 26 दिसंबर 2021 को दूसरी शादी कर ली.
हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ रिट केवल तभी लागू होती है जब बच्चे की हिरासत अवैध हो या बिना किसी कानूनी अधिकार के हो. बच्ची जन्म के बाद से ही अपनी मां और मां की मृत्यु के बाद से अपने नाना-नानी (अंकुश और लीलाबाई) और मामा-मौसी के पास रह रही है. अदालत ने कहा कि बच्ची ने जन्म से ही अपने पिता को नहीं देखा है. ऐसे में अचानक उसकी कस्टडी पिता को सौंपने से बच्ची मानसिक रूप से परेशान हो सकती है.
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पिता के पास कस्टडी हासिल करने के लिए फैमिली कोर्ट (गार्जियस एंड वार्ड्स एक्ट) में जाने का कानूनी विकल्प मौजूद है. हालांकि बच्ची के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पिता को अपनी बेटी से मिलने की अनुमति दी है. अदालत के आदेशानुसार पिता अब हर 15 दिन में एक बार (कार्यकारी शनिवार को) सुबह 11 से दोपहर 2 बजे के बीच सौंसर (छिंदवाड़ा) के तालुका विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव के कार्यालय में अपनी बेटी से मिल सकेंगे.
अदालत ने सुनवाई के दौरान पिता के आचरण पर गौर किया. कोर्ट ने पाया कि पत्नी की मृत्यु के बाद 3 साल तक पिता ने बच्ची की कस्टडी पाने के लिए कोई कानूनी प्रयास या आवेदन नहीं किया. जब बच्ची के मामा (प्रतिवादी) ने 2020 में भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया और जनवरी 2022 में पिल अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश पारित हुआ तब उसके बाद पिता ने 2023 में यह याचिका दायर की।