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मातोश्री पगडंडी सड़क निर्माण में नियमों की धज्जियां?

– मजदूरों की जगह JCB से हो रहे काम, फर्जी मजदूरों के नाम पर लाखों की हेराफेरी की चर्चा

गोरेगांव :- ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को खेती उपयोगी सामग्री खेत तक पहुंचाने तथा कृषि उत्पादित माल को समय पर बाजार तक ले जाने के उद्देश्य से राज्य शासन द्वारा राज्य रोजगार हमी योजना एवं महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार हमी योजना (मनरेगा) के माध्यम से “मातोश्री शेत पांदण योजना” चलाई जा रही है। लेकिन गोरेगांव तहसील सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इस महत्वाकांक्षी योजना के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। तहसील के अधिकांश गांवों में योजना के नियमों को ताक पर रखकर कार्य किए जाने की चर्चाएं हैं। आरोप है कि जिन कार्यों में मनरेगा मजदूरों को रोजगार मिलना चाहिए, वहां ठेकेदारों द्वारा मजदूरों की बजाय जेसीबी मशीनों का उपयोग कर सड़क निर्माण कराया जा रहा है। इससे शासन के रोजगार उपलब्ध कराने के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।

मजदूरों का हक छीने जाने की चर्चा

ग्रामीण क्षेत्र के किसान समृद्ध हों तथा बेरोजगार मजदूरों को रोजगार उपलब्ध हो, इस उद्देश्य से गोरेगांव विधानसभा क्षेत्र के विधायक विजय रहांगडाले तथा मो. अर्जुनी क्षेत्र के विधायक राजकुमार बडोले द्वारा बड़े पैमाने पर पगडंडी सड़क निर्माण कार्य मंजूर कराए गए हैं। इन कार्यों में सड़क खडीकरण के साथ-साथ सीडी वर्क (पानी निकासी संरचना) के कार्य भी शामिल हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि अधिकतर निर्माण कार्यों में मनरेगा मजदूरों को काम देने के बजाय जेसीबी मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। विशेष रूप से सीडी वर्क की खुदाई मजदूरों द्वारा कराई जानी चाहिए, लेकिन ठेकेदार मशीनों की सहायता से खुदाई कर रहे हैं। इससे स्थानीय मजदूरों में नाराजगी देखी जा रही है।

फर्जी मजदूरों के नाम पर लाखों रुपए की हेराफेरी की आशंका

सूत्रों के अनुसार, मातोश्री पगडंडी योजना अंतर्गत प्रत्येक सड़क खडीकरण कार्य में मनरेगा के अकुशल निधि मद से लगभग 6 लाख रुपए मजदूरों के बैंक खातों में जमा होने हैं। लेकिन क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि कई कार्यों में फर्जी मजदूरों के नाम दर्ज किए जा रहे हैं। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं बल्कि गरीब मजदूरों के अधिकारों पर सीधा आघात माना जाएगा।

अभियंताओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में

उल्लेखनीय है कि सड़क निर्माण के ये सभी कार्य जिल्हा परिषद बांधकाम विभाग की देखरेख में किए जा रहे हैं। साथ ही मनरेगा विभाग के दो अभियंताओं को भी योजना की निगरानी के लिए नियुक्त किया गया है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि संबंधित अभियंता कुछ जनप्रतिनिधियों के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में कार्यों की प्रभावी निगरानी नहीं हो रही है। किसानों का आरोप है कि निर्माण स्थलों पर अभियंताओं की उपस्थिति लगभग नदारद रहती है, जिसके चलते ठेकेदार अपनी मनमर्जी से कार्य कर रहे हैं।

जीआर के नियमों की खुलेआम अनदेखी

शासन के जीआर के अनुसार सड़क खडीकरण कार्य में 80 एमएम एवं 40 एमएम गिट्टी का उपयोग अनिवार्य है तथा मुरूम से घोटाई करना भी आवश्यक है। लेकिन अधिकांश निर्माण कार्यों में 80 एमएम गिट्टी का उपयोग नहीं किए जाने की शिकायत सामने आ रही है। इससे सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इसी प्रकार घटिया स्तर पर निर्माण कार्य किए गए, तो कुछ ही समय में सड़कें खराब हो जाएंगी और शासन का लाखों रुपए का निधि व्यर्थ चला जाएगा।

उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज

इन सभी आरोपों और चर्चाओं के बीच अब किसानों एवं ग्रामीणों द्वारा पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो योजना के नाम पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार सामने आ सकता है। इस बीच किसान गंगाराम दिहारी ने मांग की है कि सभी निर्माण कार्यों की तकनीकी जांच कराई जाए, मजदूरों की वास्तविक उपस्थिति की जांच हो तथा जिन कार्यों में मशीनों का उपयोग किया गया है, वहां संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। अब देखना यह होगा कि शासन और संबंधित विभाग इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं तथा किसानों और मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।


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