– खैरीचक के जंगल में बिछी लाशें; गुंजेवाही गांव के भट्टी मोहल्ले में पसरा मातम, वन विभाग के फूले हाथ-पांव!
चंद्रपुर :- जंगल का कानून बदला या इंसानी बस्तियों पर मौत का पहरा बैठ गया है? चंद्रपुर जिले की सिंदेवाही तहसील एक बार फिर दहल उठी है। गुंजेवाही-पवनपार मार्ग पर स्थित खैरीचक के घने जंगलों से जो खबर आई है, उसने पूरे जिले का कलेजा कंपा दिया है। घात लगाकर बैठे एक आदमखोर बाघ ने तेंदूपत्ता तोड़ने गई चार मासूम महिलाओं पर ऐसा खौफनाक और आक्रामक हमला किया कि चारों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। हमला इतना वीभत्स था कि चारों महिलाओं ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
अब चारों तरफ सिर्फ एक ही दहशत फैल चुकी है—”अगर जंगल की तरफ कदम बढ़ाया, तो जिंदा वापस नहीं आओगे!”![]()
तेंदूपत्ता बीनने गई थीं, मौत चुन लाईं!
रोजमर्रा की तरह गुंजेवाही गांव के भट्टी मोहल्ला (वार्ड क्रमांक 1) की चार महिलाएं सुबह हंसते-खेलते तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए खैरीचक जंगल की ओर निकली थीं। उन्हें क्या मालूम था कि झाड़ियों के पीछे साक्षात मौत उनका इंतजार कर रही है। जैसे ही ये महिलाएं जंगल के भीतर पहुंचीं, झाड़ियों में छिपे बाघ ने अपनी रफ्तार और ताकत का वो आक्रामक रूप दिखाया जिसे देखकर रूह कांप जाए।
एक के बाद एक, चारों महिलाओं पर बाघ ने हमला बोला। चीख-पुकार और खून से लथपथ वो मंजर बयां करने लायक नहीं है। बाघ की आक्रामकता के आगे चारों बेबस महिलाएं जिंदगी की जंग हार गईं और घटनास्थल पर ही चारों की सांसें थम गईं।
चीख उठा भट्टी मोहल्ला: ये हैं वो बदनसीब मृतिकाएं
इस भीषण और दिल दहला देने वाले हमले में जान गंवाने वाली चारों महिलाएं एक ही मोहल्ले की थीं। इस घटना के बाद भट्टी मोहल्ले में चूल्हे नहीं जले हैं, सिर्फ चीखें गूंज रही हैं:
कविता दादाजी मोहुर्ले (उम्र ४५ वर्ष)
अनिता दादाजी मोहुर्ले (उम्र ४६ वर्ष)
संगीता संतोष चौधरी (उम्र ४० वर्ष)
सुनीता कौशिक मोहुर्ले (उम्र ३५ वर्ष)
वन विभाग की ‘चेतावनी’ या नाकामी का ढिंढोरा?
घटना की भनक लगते ही वन विभाग के आला अधिकारी और कर्मचारियों का काफिला दलबल के साथ मौके पर पहुंचा। पंचनामा किया जा रहा है, लाशों को उठाने की प्रक्रिया चल रही है। और हमेशा की तरह वन विभाग ने ग्रामीणों के लिए एक घिसा-पिटा ‘अलर्ट’ जारी कर दिया है—”जंगल की तरफ न जाएं, सतर्क रहें!”
दहशत के साए में गुंजेवाही
इस सामूहिक हत्याकांड (बाघ द्वारा) के बाद गुंजेवाही और आसपास के पूरे इलाके में भारी जनआक्रोश और खौफ का माहौल है। ग्रामीण डरे हुए भी हैं और गुस्से में भी हैं। बाघ अब सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि इस इलाके का सबसे बड़ा ‘जलाद’ बन चुका है।
जब चंद्रपुर का बच्चा-बच्चा जानता है कि यह सीजन तेंदूपत्ता संकलन का है और ग्रामीण अपनी रोजी-रोटी के लिए जंगल पर निर्भर हैं, तो वन विभाग की गश्त टीमें कहां सो रही थीं? चार-चार मौतों का जिम्मेदार कौन? क्या सिर्फ चेतावनी दे देने से वन विभाग की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?