– “जनता पूछ रही है – विकास हुआ या सिर्फ पोस्टरबाजी?”
यासीन शेख गोंदिया :- आमगांव नगर परिषद विवाद एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी केंद्र में आ गया है। सामाजिक कार्यकर्ता तिरथ येटरे ने 7 गांवों को ग्राम पंचायत का दर्जा अब तक बहाल न किए जाने के विरोध में विधायक संजय पुराम और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए रिट याचिका दाखिल की है।
मामला वर्ष 2014 से न्यायालय में लंबित रहा। उस समय महाराष्ट्र सरकार ने आमगांव ग्राम पंचायत को नगर पंचायत घोषित करने का अध्यादेश जारी किया था। लेकिन तत्कालीन सरपंच पदमा चुटे ने केवल आमगांव नहीं बल्कि रिसामा, बनगांव, म्हाली, किंडगीपार, कुंभारटोली, बिर्सी और पदमपुर सहित 7 गांवों को मिलाकर नगर परिषद बनाने की मांग की थी।
हालांकि जनसंख्या, औद्योगिक क्षेत्र और गैर-कृषि निकषों की कमी के कारण नगर परिषद का प्रस्ताव कानूनी कसौटी पर टिक नहीं पाया। मामला नागपुर खंडपीठ से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन अंततः नगर परिषद गठन संभव नहीं हो सका और राज्य सरकार को मामला वापस लेना पड़ा।
डेढ़ साल बाद भी 7 गांव अधर में
तिरथ येटरे का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला समाप्त होने के बावजूद पिछले डेढ़ वर्ष से इन 7 गांवों को ग्राम पंचायत का दर्जा देने में जानबूझकर टालमटोल की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि 25 मार्च 2025 और 26 जुलाई 2025 को संबंधित पत्र जारी होने के बावजूद प्रशासन ने अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इन गांवों को ग्राम पंचायत का दर्जा देने में देरी क्यों हो रही है? क्या नगर परिषद के भीतर राजनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं? क्या ठेकेदार, प्रशासनिक अधिकारी और कुछ लोकप्रतिनिधि इस मुद्दे को जानबूझकर लंबित रखे हुए हैं?
“विधायक ने अपना विकास किया, गांव आज भी शून्य पर”
येटरे ने विधायक संजय पुराम पर निशाना साधते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विधायक ने केवल राजनीतिक और व्यक्तिगत विकास किया, जबकि गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि जिन गांवों को विकास का सपना दिखाया गया था, वहां आज भी सड़क, पेयजल, आवास, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं के लिए जनता संघर्ष कर रही है।
जनता का सवाल — जिम्मेदारी कौन लेगा?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि 7 गांवों को समय पर ग्राम पंचायत का दर्जा मिला होता तो विकास योजनाएं तेजी से लागू हो सकती थीं। लेकिन प्रशासनिक अनिश्चितता के कारण गांवों का विकास पूरी तरह ठप हो गया।
अब जनता पूछ रही है — “क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ पोस्टर लगाना और रैलियां निकालना है, या गांवों के विकास के लिए ठोस कदम उठाना भी?”
आमदार का कर्तव्य क्या है?
एक विधायक का मुख्य दायित्व अपने क्षेत्र की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना और उनका समाधान करवाना होता है। ऐसे में 7 गांवों का प्रश्न वर्षों से लंबित रहने पर स्थानीय विधायक की भूमिका और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है।
फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों से निकलकर कानूनी मोर्चे तक पहुंच चुका है, और आने वाले दिनों में यह मामला गोंदिया जिले की राजनीति में बड़ा विवाद बन सकता है।



