– जंगल रो रहे, जिम्मेदार सो रहे? शिकायतों के बाद भी नहीं जागा तंत्र; ‘सब सेट’ के खेल में झुका प्रशासन?
– रेलवे ट्रैक पर बाबुल की आड़ में अन्य पेड़ों का ‘गेम’; बिना परमिशन कत्लेआम!
नागपुर/सावनेर :- यह सावनेर वन परिक्षेत्र के इतिहास का सबसे शर्मनाक अध्याय माना जा रहा है। पिछले दिनों ‘सावनेर वन क्षेत्र में हरियाली पर डाका’ और कथित संबंधित अधिकारी ‘बावने’ की संदिग्ध भूमिका को लेकर हुए सिलसिलेवार खुलासों के बाद भी वन विभाग के उच्च अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। पर्यावरण प्रेमियों ने लगातार आगाह किया था कि अगर तत्काल छापेमारी नहीं हुई तो सबूत मिटा दिए जाएंगे और करोड़ों की लकड़ी ठिकाने लगा दी जाएगी। लेकिन कई दिन गुजर जाने के बावजूद धरातल पर किसी ठोस कार्रवाई का कहीं अता-पता नहीं है। हालात ऐसे हैं मानो शिकायतों और सूचनाओं का अंबार लग गया हो, लेकिन जिम्मेदार तंत्र ने कथित तौर पर आंखें मूंद रखी हों। न कोई बड़ी जांच, न कोई व्यापक छापेमारी और न ही कोई ठोस परिणाम सामने आया है। ऐसे में क्षेत्र में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर कार्रवाई को रोक कौन रहा है? शिकायतों के अंबार के बाद भी वन विभाग मौन है; आखिर किसकी तिजोरी भर रहे हैं सावनेर के तस्कर? आखिर यह चुप्पी क्या बयां करती है? क्या वाकई ऊपर से लेकर नीचे तक पूरा सिस्टम तस्करों के रसूख के आगे घुटने टेक चुका है? यह आशंका अब गहराने लगी है।
रेलवे ट्रैक पर ‘बाबुल’ की आड़ में बड़ा खेल! – इसी बीच सूत्रों के हवाले से एक और बेहद चौंकाने वाली और गंभीर जानकारी सामने आ रही है, जिसने वन विभाग की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। जानकारी के अनुसार, सावनेर से टाकली मालेगांव के समीप रेलवे ट्रैक से जुड़े क्षेत्र में सफाई के नाम पर सिर्फ ‘बाबुल’ के पेड़ों को काटने की हिदायत दी गई थी। सूत्रों का दावा है कि कुछ भ्रष्ट वन अधिकारियों की कथित मिलीभगत और शह के चलते तस्करों ने बाबुल की आड़ में वहां मौजूद अन्य बेशकीमती और हरे-भरे पेड़ों को भी बेरहमी से काट डाला। चौंकाने वाली बात यह है कि इन अन्य पेड़ों को काटने की कोई वैध परमिशन (अनुमति) तक नहीं ली गई थी। क्षेत्र में ऐसी चर्चा भी चल रही है कि बाबुल की कटाई के नाम पर अन्य पेड़ों को साफ करने का यह ‘खतरनाक गेम’ अधिकारियों के कथित आशीर्वाद के बिना मुमकिन नहीं है। यह पूरा घटनाक्रम और इस पर प्रशासन की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ इन दावों और आशंकाओं पर सीधे तौर पर मुहर लगाती है।

मुख्यालय छोड़ नागपुर से आना-जाना और कॉल रिकॉर्ड्स की जांच की मांग- पिछली रिपोर्ट में यह सवाल प्रमुखता से उठाया गया था कि संबंधित अधिकारी ‘बावने’ को लेकर क्षेत्र में लगातार चर्चाएं क्यों हो रही हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि संबंधित अधिकारी सप्ताह में महज पांच दिन ही ड्यूटी पर आते हैं, जबकि वनरक्षक/बीट गार्ड की जिम्मेदारी चौबीसों घंटे २४x७ प्रकृति की मानी जाती है। चर्चा यह भी है कि उन्हें खापा मुख्यालय में रहना अनिवार्य है, लेकिन वे प्रतिदिन नागपुर से आना-जाना करते हैं। यदि इन दावों में सच्चाई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होना बेहद आवश्यक है। स्थानीय नागरिकों और वन प्रेमियों का कहना है कि उपस्थिति रजिस्टर, दौरा डायरी तथा अन्य आधिकारिक अभिलेखों की जांच की जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके। उनका यह भी कहना है कि यदि जांच एजेंसियां आवश्यक समझें, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित कॉल रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की भी जांच की जाए, जिससे क्षेत्र में चल रही चर्चाओं की सच्चाई सामने आ सके और हकीकत क्या है, यह स्पष्ट हो सके।
सुधाकर ठेकेदार की गाड़ी और नजीम की कथित ‘सेटिंग’ – इसके साथ ही, क्षेत्र में चर्चा है कि पाटनसावंगी/दहेगांव के सुधाकर नामक ठेकेदार की जो गाड़ी पकड़ी गई थी, उसे नजीम नामक व्यक्ति द्वारा कथित ‘सेटिंग’ के खेल में बिना किसी कड़ी कार्रवाई के छोड़ दिया गया। इस मामले की भी गहन जांच होनी चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि इस खेल में भी कथित बावने नामक अधिकारी शामिल था या फिर कोई अन्य। इसके साथ ही, क्षेत्र की तमाम आरा मशीनों के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगालने की मांग की गई थी ताकि तस्करों की रात वाली शिफ्ट का भंडाफोड़ हो सके। इन गंभीर इनपुट्स के बावजूद नागपुर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने एक बार भी सावनेर का रुख करना जरूरी नहीं समझा। स्थानीय नागरिकों का अब यह शक यकीन में बदल रहा है कि बाहर से आने वाली जिस जांच टीम के पहले से ‘सेट’ होने की चर्चा थी, वह शत-प्रतिशत सच साबित हुई है। आज भी करोड़ों का माल डंप पड़ा है, पर साहब को सबूत चाहिए! सवाल यह उठ रहा है कि क्या बाहर की टीम भी इनसे मिली हुई है, जिसके चलते इनके हौसले इतने बुलंद हैं? जनता और वन प्रेमियों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि यदि जांच सटीक हुई और आरोप साबित हुए, तो क्या कथित बावने नामक अधिकारी पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई होगी?

नियमों की उड़ी धज्जियां: रात भर चलती हैं आरा मशीनें – संबंधित अधिकारी की कथित सरपरस्ती के चलते क्षेत्र में आरा मशीनों के नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाए जाने के आरोप लग रहे हैं। नियमों के मुताबिक आरा मशीनें संचालित करने का एक निश्चित समय होता है, लेकिन सावनेर क्षेत्र में जब मन में आए, तब यानी देर रात तक और तड़के सुबह तक आरा मशीनें बेधड़क चलाई जा रही हैं। नियमों को ताक पर रखकर रात के सन्नाटे में लकड़ियों को चीरा जा रहा है ताकि अवैध कटाई के सारे सबूतों को तुरंत नष्ट किया जा सके। इसके बावजूद किसी भी जिम्मेदार अधिकारी का इस ओर ध्यान न जाना समझ से परे है। इसी वजह से पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है। उनका कहना है कि प्रशासन कार्रवाई न करने के बहाने ढूंढ रहा है। क्षेत्र के सजग नागरिकों ने चुनौती देते हुए कहा है हम आज भी पूरी जिम्मेदारी के साथ दावा करते हैं कि सावनेर की कई संदिग्ध आरा मशीनों में और उनके 200 मीटर के लगभग आजू-बाजू में करोड़ों रुपये का अवैध माल डंप पड़ा है। रेलवे ट्रैक से काटे गए अवैध पेड़ भी इन्हीं आरा मशीनों में खपाए जा रहे हैं। रात के सन्नाटे में आरा मशीनें नियमों की धज्जियां उड़ाकर आज भी चल रही हैं। अगर नागपुर या मुंबई की विजिलेंस टीम स्थानीय स्टाफ को बिना भनक लगे आज रात ही औचक छापेमारी करे, तो इस पूरे ‘महाघोटाले’ का पर्दाफाश हो जाएगा। सभी आरा मशीनों के पिछले एक महीने के CCTV फुटेज (DVR) जब्त किए जाएं, तस्कर खुद-ब-खुद सच उगल देंगे। लेकिन सवाल वही है—क्या कोई ईमानदार अधिकारी इस दलदल में हाथ डालने की हिम्मत दिखाएगा?” पिछली बार की तरह इस बार भी पर्यावरण प्रेमी सिर्फ मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि अब वे सीधे आंदोलन की राह पर हैं। उनका साफ कहना है कि सावनेर और नागपुर स्तर के वन अधिकारियों से निष्पक्षता की उम्मीद करना बेईमानी होगी। जब रक्षक ही भक्षकों के साथ कथित ‘चाय-पानी’ के खेल में व्यस्त हों, तो फिर जांच कैसी? इसलिए, स्थानीय जांच का नाटक बंद करो और सीधे मुंबई विजिलेंस को कमान सौंपो, ऐसी मांग पर्यावरण प्रेमी और जनता कर रही है।
“सबूत मिटने का इंतजार कर रहे हैं साहब?” पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि वरिष्ठ अधिकारी जानबूझकर मामले को टाल रहे हैं ताकि कुछ आरा मशीन संचालक रात-दिन मशीनें चलाकर अवैध लकड़ी को चीर दें और सारे सबूत हमेशा के लिए खत्म हो जाएं। नियमों को ताक पर रखकर रात भर चलने वाली इन आरा मशीनों पर आखिर किसका वरदहस्त है?
ऊपर से आने वाली टीम भी सेट!”… क्षेत्र में सुगबुगाहट तेज?
सबसे हैरान और डराने वाली चर्चा यह चल रही है कि क्षेत्र में कुछ आरा मशीनों से ₹40,000 और ठेकेदारों से ₹20,000 का मासिक हफ्ता कथित रूप से वसूला जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह पूरा कलेक्शन ‘देव’ और ‘नजीम’ नामक व्यक्तियों द्वारा किए जाने की चर्चा है। क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि इस कथित खेल से जुड़े नजीम और देव ही पूरे तंत्र के मुख्य सूत्रधार हो सकते हैं, जिनका संबंधित अधिकारी ‘बावने’ से कथित तौर पर मधुर संबंध होने के दावे किए जा रहे हैं।
यही कारण है कि इस कथित महालूट की भनक लगने के बाद बाहर से जो एक विशेष जांच टीम आने की सुगबुगाहट है, उसे लेकर भी यह चर्चा गर्म है कि उसका ‘जुगाड़’ पहले ही करने का प्रयास किया गया है! स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कुछ रसूखदार आरा मशीन संचालकों, देव और नजीम ने कथित रूप से मिलकर आने वाली टीम को ‘संतुष्ट’ करने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने की पूरी फील्डिंग सजा ली है। तस्करों के इस कथित आत्मविश्वास और क्षेत्र में चल रही इन गंभीर चर्चाओं ने ईमानदार वन प्रेमियों के होश उड़ा दिए हैं और वे इस पूरे मामले की निष्पक्ष विजिलेंस जांच की मांग कर रहे हैं।







