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तेल कंपनियों को ₹1.23 लाख करोड़ की मदद

– उर्वरक कीमतों पर बढ़ा दबाव

नई दिल्ली :- पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए लगभग 1.23 लाख करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह सहायता तेल कंपनियों को बढ़ती लागत और अंडर-रिकवरी से उबारने के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में संभावित वृद्धि के बोझ से बचाने के लिए दी गई है।

सूत्रों के मुताबिक, यह वित्तीय सहायता पश्चिम एशिया संघर्ष के शुरुआती 78 दिनों के दौरान हुई अंडर-रिकवरी की भरपाई के लिए दी गई है। इसमें केंद्र सरकार द्वारा ईंधन पर किए गए उत्पाद शुल्क में कटौती का प्रभाव भी शामिल है।

सरकारी सूत्रों ने बताया कि कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात पर बढ़ती निर्भरता तथा वैश्विक बाजार में ऊंची कीमतों के कारण ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की अंडर-रिकवरी अब भी चिंताजनक स्तर पर बनी हुई है। वर्तमान में तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 652 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, तो ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव और बढ़ सकता है, जिसका असर सरकारी वित्त और उपभोक्ता दोनों पर दिखाई दे सकता है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, तेल के साथ-साथ उर्वरक क्षेत्र भी गंभीर दबाव में है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की उपलब्धता सीमित होती जा रही है, जबकि मांग बनी हुई है। इसके चलते उर्वरकों की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। सरकार का मानना है कि निकट भविष्य में उर्वरकों की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट की संभावना कम है। यही वजह है कि उर्वरक मंत्रालय ने मौजूदा बजटीय आवंटन 1.77 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले सब्सिडी राशि में 100 प्रतिशत तक वृद्धि की मांग की है।

सरकारी सूत्रों ने बताया कि हाल के महीनों में सोने के आयात में गिरावट दर्ज की गई है। इसका प्रमुख कारण सोने पर लगाया गया उच्च आयात शुल्क माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ाने से अनावश्यक आयात पर नियंत्रण लगाने और चालू खाते के घाटे को सीमित करने में मदद मिली है।

विनिवेश कार्यक्रम को लेकर सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया जारी है और इसे हर हाल में पूरा किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और संबंधित कार्यवाही नियोजित तरीके से जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो ऊर्जा और उर्वरक दोनों क्षेत्रों पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में सरकार को उपभोक्ताओं और किसानों को राहत देने के लिए अतिरिक्त वित्तीय कदम उठाने पड़ सकते हैं। फिलहाल सरकार तेल कंपनियों को वित्तीय सहायता और सब्सिडी तंत्र के माध्यम से कीमतों के झटके को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही है।


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