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भाषा नहीं सिर्फ बहस: मनसे की मान्यता रद्द करने की मांग से बढ़ी राजनीतिक गरमाहट

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– हिंदी न बोलने वालों पर दबाव, मराठी भाषा को जबरदस्ती थोपना

– उच्च न्यायालय में उठे गंभीर सवाल”

मुंबई  :- मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंदी भाषी नागरिकों पर हमला करने और उन्हें मराठी भाषा का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करने का मामला दर्ज करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने पर सोमवार को हाईकोर्ट ने सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की पीठ ने याचिकाकर्ता घनश्याम उपाध्याय को निर्देश दिया कि वह अदालत को आश्वस्त करें कि याचिका दायर करने का औचित्य है। अदालत ने याचिका पर सुनवाई यह कहते हुए स्थगित कर दी कि वह उचित समय पर जनहित याचिका पर सुनवाई करेगी। उपाध्याय की ओर से अधिवक्ता सुभाष झा ने अदालत को बताया कि मनसे कार्यकर्ता मुंबई, ठाणे, रायगढ़ और पुणे जैसे प्रमुख शहरों में हिंदी भाषी लोगों को परेशान कर रहे हैं।

अदालत ने सुनवाई यह कहते हुए स्थगित कर दी कि पहले याचिका दायर करने पर सुनवाई होगी और जल्द ही इसके लिए तारीख दी जाएगी। याचिका में राज्य सरकार के 16 अप्रैल, 2025 के फैसले का हवाला दिया गया है। राज्य सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में त्रिभाषा नीति लागू की थी। हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य कर दिया गया था। इससे दो दशकों से भी ज़्यादा समय से एक-दूसरे से झगड़ रहे दो भाइयों, उद्धव और राज, को एक साथ आने का मौका मिल गया। राज के इशारे पर उनके कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के हिंदी भाषियों की पिटाई कर रहे हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है, जिसमें मांग की गई है कि मनसे की चुनाव आयोग द्वारा दी गई मान्यता को रद्द किया जाए।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि राज ठाकरे और उनके समर्थक हिंदी भाषियों पर हमला कर रहे हैं और मराठी भाषा को जबरदस्ती थोपने की घटनाएँ बढ़ी हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि राज ठाकरे ने गुड़ी पड़वा के दौरान उनके कार्यकर्ताओं को महाराष्ट्र में नहीं मराठी बोलने वालों की स्थिति जांचने का आदेश दिया था, जिसका परिणाम स्वरूप कई स्थानों पर विवाद और हिंसा हुई। वकील सुनिल शुक्ला ने चुनाव आयोग से यह भी अनुरोध किया है कि मौजूदा घटनाओं के मद्देनज़र मनसे पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए।

न्यायालय के समक्ष ‘भाषा की न्याय’ की गुहार

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की भाषा आधारित धमकियाँ एवं हिंसा, लोकतंत्र व संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं। इसके अलावा, कुछ मामलों में मराठी भाषा के प्रयोग को लेकर बैंक, दुकानों तथा सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में पुलिस शिकायतों और नोटिस जारी किए गए हैं। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि मान्यता रद्दीकरण से राज्य में भाषाई समानता और सुरक्षा की भावना को मजबूती मिलेगी। दूसरी तरफ़ मनसे का कहना है कि मराठी भाषा का गौरव हो लेकिन हिंसा या धमकी के तरीके स्वीकार नहीं हों। सरकार ने तीन-भाषा नीति के अंतर्गत हिंदी को विद्यालयों में अनिवार्य बनाने वाली सरकारी प्रस्ताव)को विवाद के बाद वापस लिया है। अब इस याचिका पर सुनवाई कब होगी और चुनाव आयोग या न्यायालय क्या निर्णय करता है, इस पर पूरे राज्य में लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं।