spot_imgspot_img

Top 5 This Week

spot_img

नारायण विद्यालय: वर्धा, अमरावती, कोराड़ी, नागपुर शाखाओं में श्रम कानूनों की अनदेखी पर बवाल..!

नागपुर – महाराष्ट्र के वर्धा, अमरावती, कोराड़ी रोड (नागपुर) समेत कई स्थानों पर फैले नारायण विद्यालय समूह पर श्रम कानून उल्लंघन और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्कूल प्रबंधन पर आरोप है कि वह एक विशाल शैक्षणिक संस्थान होने के बावजूद कर्मचारियों के हक़ की अनदेखी कर रहा है और लेबर कानूनों का पालन नहीं कर रहा। संस्थान से जुड़े कुछ कर्मचारियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि स्कूल में कर्मचारी भविष्य निधि (PF) तथा कर्मचारी राज्य बीमा (ESIC) जैसी अनिवार्य सुविधाओं से उन्हें वंचित रखा जा रहा है। प्रबंधन पर यह भी इल्ज़ाम है कि वह अपनी राजनीतिक पहुंच का हवाला देकर शिकायतों को दबाने की कोशिश करता है। अभिभावकों द्वारा पहले भी फीस संबंधी शिकायतें उच्च स्तर पर उठाई गईं, लेकिन प्रबंधन के रसूख के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई। अब कर्मचारी और अभिभावक न्याय की गुहार लगा रहे हैं कि श्रम विभाग से लेकर कर विभाग तक संबंधित प्राधिकरण स्कूल की गहन जांच करें और आवश्यक कदम उठाएं।

श्रम कानूनों का उल्लंघन: PF व ESIC जैसी सुविधाओं से वंचित

भारत के श्रम कानूनों के तहत प्रत्येक नियोक्ता को अपने कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करनी होती है। कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम 1952 के अनुसार 20 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले हर संस्थान में PF सुविधा लागू होना अनिवार्य है। विशेष रूप से निजी शैक्षणिक संस्थानों पर भी PF का प्रावधान स्पष्ट रूप से लागू होता है – यदि कोई स्कूल PF नहीं देता है तो शिक्षक कानूनी सहायता ले सकते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, नारायण विद्यालय के कर्मचारियों का आरोप है कि अनेक शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन से PF/ESI की कटौती या तो की ही नहीं जाती, और यदि की भी जाती है तो उसे संबंधित खातों में जमा नहीं कराया जाता। यह न केवल कर्मचारियों के अधिकारों का हनन है, बल्कि एक कानूनन अपराध भी है।

EPF/ESI का पालन न करने पर कड़ी सज़ा का प्रावधान है – EPF योगदान जमा न करने पर एक साल तक की कैद और ₹5,000 जुर्माना (पुनरावृत्ति होने पर तीन साल तक की कैद) तथा ESI में जानबूझकर गड़बड़ी पर दो साल तक की कैद व ₹5,000 तक जुर्माने का प्रावधान है। हाल ही में, अक्टूबर 2023 में चंडीगढ़ की एक अदालत ने ESIC बनाम समीर गुप्ता मामले में श्रम कानून की अवहेलना के लिए संबंधित नियोक्ता को तीन महीने की सादा कैद और अर्थदंड की सज़ा सुनाई। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि PF/ESI में गड़बड़ी कानूनन गंभीर अपराध है और इसके लिए स्कूल प्रबंधन को भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

नारायण विद्यालय के मामले में कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रबंधन का ध्यान PF/ESI न मिलने की ओर दिलाने की कोशिश की, लेकिन हर बार आश्वासन देकर उन्हें टाल दिया गया। कुछ कर्मचारियों का यह भी दावा है कि प्रबंधन के लोग खुलेआम कहते हैं, “हमारी ऊपर तक पहुंच है, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता,” जिससे कर्मचारियों में भय का माहौल है। एक अनाम शिक्षक ने बताया, “यहां कई स्टाफ को अनुबंध पर रखकर कम वेतन दिया जाता है और PF तो नाम मात्र को है। आवाज़ उठाने पर नौकरी जाने का डर दिखाया जाता है।” ऐसे वातावरण में कर्मचारी खुलकर शिकायत करने से डरते हैं, मगर श्रम विभाग, EPFO और ESIC को शिकायत मिलने पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए ताकि कर्मचारियों के हक़ बहाल हो सकें।

फीस कलेक्शन में गड़बड़ी और कर चोरी की आशंका

नारायण विद्यालय प्रबंधन पर केवल श्रम कानून ही नहीं, बल्कि वित्तीय अनियमितताओं के भी आरोप लग रहे हैं। गत वर्षों में स्कूल की फ़ीस वसूली को लेकर भी भारी विवाद हुआ था। कोरोना महामारी के दौरान जब महाराष्ट्र सरकार ने स्कूल फीस में रियायत के निर्देश दिए थे, तब नारायण विद्यालय (वर्धा रोड शाखा) पर पूर्ण फीस लेने का आरोप लगा। अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन किए और शिक्षा विभाग से लेकर विधानसभा अध्यक्ष नाना पटोले तक से इसकी शिकायत की, लेकिन शुरुआत में कहीं सुनवाई नहीं हुई।

बाद में शिक्षा विभाग द्वारा किए गए ऑडिट में खुलासा हुआ कि स्कूल ने तीन सालों में अभिभावकों से लगभग ₹7.59 करोड़ की अतिरिक्त फीस अवैध रूप से वसूली थी। विभाग ने दिसंबर 2020 में स्कूल प्रबंधन को यह अतिरिक्त राशि अभिभावकों को लौटाने का नोटिस जारी किया। मामला जब तूल पकड़ने लगा तो नागपुर खंडपीठ ने अंतरिम राहत देते हुए तत्काल किसी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई, मगर इस बीच राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि अतिरिक्त वसूली गई फीस हर हाल में लौटानी होगी। महाराष्ट्र के स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री बच्चू कडू ने प्रेस वार्ता में कहा था कि नागपुर शहर के लगभग सभी निजी स्कूलों ने मिलकर कुल ₹100 करोड़ से ज्यादा की अतिरिक्त फीस वसूली नियमों को ताक पर रखकर की है, जिसमें नारायण विद्यालय का मामला सबसे प्रमुख है ऐसी चर्चा चारों तरफ चल रही है।

इन वित्तीय अनियमितताओं से यह प्रश्न उठता है कि क्या स्कूल के लेखा-बही (बैलेंस शीट) सच को छुपा रहे हैं? सूत्रों का कहना है कि स्कूल द्वारा छात्रों से नगद शुल्क के रूप में बड़ी रकम वसूली जाती है, लेकिन उसे पूरी तरह औपचारिक खातों में नहीं दर्शाया जाता। कर्मचारियों के PF/ESI न जमा करने से जहां स्कूल का खर्च कृत्रिम रूप से कम दिखता है, वहीं अभिभावकों से वसूली गई रकम का बड़ा हिस्सा उचित मदों में नहीं दर्शाया जाना संभावित कर चोरी की ओर इशारा करता है। यदि स्कूल की बैलेंस शीट में कर्मचारियों के वेतन व कानूनी देयों का खर्च वास्तविक अनुपालन लागत से कम दिख रहा है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं हेरा-फेरी हो रही है। आयकर विभाग और अन्य वित्तीय निरीक्षण एजेंसियों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है कि कहीं टैक्स बचाने या अवैध लाभ कमाने के लिए गैर-कानूनी तरीके तो नहीं अपनाए जा रहे। ऐसी अनियमितताएं न केवल कानून के खिलाफ हैं, बल्कि ईमानदार करदाताओं और अभिभावकों के विश्वास के साथ धोखा भी हैं।

कोराड़ी और अमरावती शाखा से : कर्मचारियों की गुमनाम गवाही..!

नारायण विद्यालय की कोराड़ी रोड (नागपुर) शाखा और अमरावती शाखा के कुछ कर्मचारियों ने अपने नाम उजागर न करने की शर्त पर संस्थान के अंदरूनी हालात पर रोशनी डाली। कोराड़ी शाखा के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने बताया कि स्कूल प्रबंधन नियम-कानून को दरकिनार कर कर्मचारियों से मनमाना व्यवहार करता है। “हमें नियमित रूप से अतिरिक्त घंटों तक कार्य कराया जाता है, लेकिन ओवरटाइम का कोई भुगतान नहीं मिलता,” उन्होंने कहा। “ESIC की सुविधा तो दूर, हमारे अधिकांश सहकर्मियों के लिए कोई स्वास्थ्य बीमा तक नहीं है। अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो सारा खर्च खुद उठाना पड़ता है,” इस कर्मचारी ने तकलीफ़ बयां की। उनके अनुसार, कई अस्थायी शिक्षकों को बिना उचित नियुक्ति पत्र के काम पर रखा गया है, ताकि कानूनी जवाबदेही से बचा जा सके। यह श्रम कानूनों का सीधा उल्लंघन है।

अमरावती शाखा के एक शिक्षक ने आर्थिक अनियमितता का आरोप लगाते हुए कहा, “हमसे कहा जाता है कि सैलरी का एक हिस्सा नकद लिया जाए। स्कूल प्रबंधन हमारे कुछ सहकर्मियों को अधिक वेतन पर हस्ताक्षर करवाकर कम नकद भुगतान करता है।” यह तरीका काले धन को बढ़ावा देने और EPF योगदान को कम दिखाने के लिए अपनाया जाता है, जिससे कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित नहीं रहता। अमरावती शाखा के ही एक अन्य कर्मचारी ने जोड़ा कि “स्कूल ने हमारी कई सहूलियतें कागज़ों पर दिखा रखी हैं, हकीकत में हमें कुछ नहीं मिलता। छुट्टियों का पैसा काट लिया जाता है, बोनस-ग्रेच्युटी की तो बात ही नहीं होती।” इन आरोपों से स्पष्ट होता है कि संस्था के भीतर श्रमिकों का शोषण हो रहा है और कागज़ी खानापूर्ति कर प्रबंधन अपनी छवि बनाए हुए है।

कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने कई बार सामूहिक रूप से आवाज उठाने की कोशिश की, लेकिन हर बार प्रबंधन ने सख्ती दिखाकर मामले को दबा दिया। “जो थोड़ा बहुत विरोध करते हैं, उनके ऊपर काम का दबाव बढ़ा दिया जाता है या तबादले की धमकी दी जाती है,” एक शिक्षिका ने बताया। ऐसे में अधिकांश स्टाफ चुपचाप सहने को मजबूर हैं। कर्मचारी यूनियन जैसी कोई प्रभावी इकाई न होने के कारण उनकी शिकायतें ऊपर तक नहीं पहुंच पातीं। यह स्थिति श्रम कानूनों की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करती है। कर्मचारियों ने उम्मीद जताई है कि मीडिया में मामला आने के बाद सरकार और प्रशासन उनकी आवाज़ सुनेंगे।

कार्रवाई की मांग: शासन व प्रशासन से हस्तक्षेप की गुहार

नारायण विद्यालय की इन शाखाओं में व्याप्त कथित अनियमितताओं पर अब तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। शिक्षा एवं श्रम जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संस्था यदि श्रम कानूनों का पालन नहीं कर रही, तो यह अन्य संस्थानों के लिए भी गलत नज़ीर बन जाएगी। महाराष्ट्र सरकार के संबंधित मंत्रियों – विशेषकर राज्य के श्रम मंत्री व स्कूल शिक्षा मंत्री – को इन आरोपों पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। इसी के साथ स्थानीय प्रशासन, श्रम आयुक्त कार्यालय, ईपीएफओ (EPFO) तथा ईएसआईसी (ESIC) के क्षेत्रीय अधिकारियों को मिलकर स्कूल की गहन जांच करनी चाहिए। कर्मचारियों के PF एवं ESI रिकॉर्ड, स्कूल की बैलेंस शीट, फीस संग्रह और कर विवरण का ऑडिट निष्पक्ष एजेंसी द्वारा कराया जाना चाहिए ताकि सच सामने आ सके। अगर जांच में उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो कानूनी प्रावधानों के तहत कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए – जिसमें बकाया PF/ESI राशि की वसूली, जुर्माना, और जरूरत पड़ने पर फ़ौजदारी मुकदमा तक शामिल है।

सबसे अहम बात यह है कि इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर बैठे जनप्रतिनिधि भी ध्यान दें। विदर्भ क्षेत्र के इन विद्यालयों से जुड़े मामले पहले भी विधानसभा अध्यक्ष स्तर तक पहुंच चुके हैं, लेकिन पर्याप्त हल नहीं निकला। अब आवश्यकता है कि क्षेत्र के विधायक, सांसद और मंत्रीगण खुद हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें। स्कूल प्रबंधन को भी स्पष्ट संदेश दिया जाए कि राजनीतिक संबंधों का दुरुपयोग कर कानून से ऊपर बनने की कोशिश बर्दाश्त नहीं होगी। अगर नारायण विद्यालय ने वाकई कानून तोड़े हैं तो उसे जवाबदेह ठहराया जाए, ताकि राज्य में अन्य शैक्षणिक संस्थान ऐसे व्यवहार से सबक लें। नारायण विद्यालय मामले ने दिखाया है कि एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के आवरण तले किस तरह श्रमिकों के अधिकारों और अभिभावकों के विश्वास के साथ खिलवाड़ हो सकता है। यह सुनिश्चित करना प्रशासन का दायित्व है कि शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले संस्थानों में कानून का पालन हो और पारदर्शिता रहे। न्याय के हित में संबंधित विभागों द्वारा सघन जांच और दोषियों पर कठोर कार्रवाई ही इस “बड़ी मछली” को कानून के जाल में ला सकती है। प्रदेश के हज़ारों शिक्षकों-कर्मचारियों और अभिभावकों की नज़र अब सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी है। हम महाराष्ट्र सरकार और स्थानीय प्रशासन से अपील करते हैं कि इन शिकायतों पर अविलंब कार्यवाही कर श्रमिकों व अभिभावकों को न्याय दिलाएं तथा शिक्षा जगत में कानून के राज को स्थापित करें। समुदाय को उम्मीद है कि इस बार उनकी आवाज़ अनसुनी नहीं जाएगी और नारायण विद्यालय प्रकरण एक मिसाल बनेगा कि कानून से बढ़कर कोई नहीं, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो।


Click above on our news logo to access the Daily E_Newspaper.
For articles or advertisements, contact us at: dineshdamahe86@gmail.com.

Copyright Disclaimer: If Any Image, video or article belongs to its respective owner/creator. Full credit goes to the original creator. No copyright infringement intended.