– फीस बकाया होने पर छात्रा को स्कूल से नहीं निकाल सकते
नागपुर :- बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल फीस बकाया होने के आधार पर 13 वर्षीय छात्रा को स्कूल से निकाला नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि 6 से 14 वर्ष आयु के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है और इसे किसी भी परिस्थिति में बाधित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राज वाकोडे की पीठ ने एक छात्रा को सातवीं कक्षा में बकाया 23,900 रुपये फीस के कारण जारी ट्रांसफर सर्टिफिकेट को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि शिक्षा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21-ए तथा बच्चों को मुफ्त और जरूरी शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत संरक्षित है।
यह है मामला : छात्रा भंडारा जिले के एक सीबीएसई स्कूल में पढ़ती थी, जिसे बकाया फीस न चुकाने के कारण 27 मार्च 2025 को ट्रांसफर सर्टिफिकेट जारी कर स्कूल से निकाल दिया था। इसके खिलाफ छात्रा के पिता ने हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की थी। वहीं दूसरी ओर स्कूल प्रशासन दावा कर रहा था कि उनकी स्कूल सीबीएसई से संबद्ध और अल्पसंख्यक संस्था होने से शिक्षा का अधिकार अधिनियम उन पर लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि संबंधित स्कूल ने राज्य सरकार से मान्यता लेते समय नियमों का पालन करने की शर्त स्वीकार की थी, इसलिए वह शिक्षा के अधिकार कानून से खुद को अलग नहीं कर सकता। स्कूल प्रबंधन विलंब शुल्क वसूल सकता है
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि स्कूल प्रबंधन अधिकतम विलंब शुल्क या दंडात्मक ब्याज वसूल सकता है, लेकिन छात्र को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले ने महाराष्ट्र शैक्षणिक संस्थान (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2011 की धारा 3(ए) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि फीस न चुकाने पर निष्कासन का प्रावधान नहीं है।
महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ‘सुखदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा संस्थानों की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यार्थियों का समग्र विकास और मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि उन्हें दंडात्मक कार्रवाई से शिक्षा से वंचित करना। अदालत ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट रद्द करते हुए छात्रा को पुनः प्रवेश देने का निर्देश दिया तथा दो सप्ताह में बकाया फीस जमा करने को कहा। साथ ही, मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए स्कूल को विलंब शुल्क या दंडात्मक ब्याज न लेने का भी आदेश दिया।