– मेयर पद का फैसला देगा बड़ा राजनीतिक संदेश
नागपुर :- महानगरपालिका में सामान्य महिला वर्ग के लिए मेयर पद आरक्षित होते ही शहर की राजनीति में हलचल तेज़ हो गई है। आरक्षण की घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों और भाजपा के भीतर ही चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी इस अहम पद के लिए अनुभव को तरजीह देगी या नज़दीकी और भरोसे को आधार बनाएगी।
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार मेयर पद की दौड़ में शिवानी दाणी, अश्विनी जिचकार और नीता ठाकरे के नाम सबसे आगे हैं। वहीं मनीषा आतकरे, विशाखा मोहन, मंगला खेकड़े, साधना बर्डे और दिव्या धुरडे जैसे नाम भी लगातार चर्चाओं में बने हुए हैं।
हालांकि फिलहाल चर्चा नामों से ज़्यादा चयन की नीति और मापदंडों को लेकर हो रही है। राजनीतिक हलकों में खुले तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार पार्टी अनुभव को प्राथमिकता देगी, राजनीतिक समीकरण या फिर निर्णय किसी और आधार पर होगा। हर आरक्षण के समय अनुभव और वरिष्ठता को महत्व देने की बात ज़रूर की जाती है, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार अंतिम फैसले में अक्सर नए और ‘सुरक्षित’ माने जाने वाले नामों को तरजीह मिलती दिखती है। यही वजह है कि पार्टी के भीतर दबे स्वर में असंतोष और नाराज़गी की चर्चाएं भी शुरू हो चुकी हैं।
अगर इस बार भी वर्षों से मेहनत करने वाली, कई बार चुनकर आई नगरसेविकाओं को नज़रअंदाज़ किया गया, तो यह संदेश जाएगा कि संघर्ष और अनुभव से ज़्यादा महत्व व्यक्तिगत नज़दीकियों को दिया जा रहा है।
मेयर पद का फैसला केवल एक नाम तय नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि पार्टी अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं को क्या संदेश देना चाहती है। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज़ है और सभी की निगाहें भाजपा के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं। इस बार बाज़ी अनुभव मारेगा या करीब होने का वजन भारी पड़ेगा?
अनुभव बनाम प्रभाव
अनुभवी पार्षद अश्विनी जिचकार को सदन संचालन का अच्छा अनुभव है और पार्टी नेतृत्व का भरोसा भी उनके साथ बताया जाता है। वहीं नीता ठाकरे पूर्व में मनपा में भाजपा की उपनेता रह चुकी हैं और महिला व बाल कल्याण समिति की सभापति के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई है।
दूसरी ओर, संघ की पसंद मानी जा रहीं शिवानी दाणी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। हालांकि वे पहली बार पार्षद बनी हैं, लेकिन RSS से पारिवारिक जुड़ाव, राष्ट्र सेविका समिति में सक्रिय भूमिका और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के करीबी होने को उनका बड़ा प्लस पॉइंट माना जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि अंतिम फैसला फडणवीस-गडकरी की सहमति से ही होगा।
भीतरखाने असंतोष की आहट?
इसके बावजूद पार्टी के भीतर यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है कि क्या इस बार भी अनुभव को दरकिनार कर “सुरक्षित और करीबी” चेहरे को तरजीह दी जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मेयर पद केवल सम्मान का नहीं, बल्कि प्रशासनिक समझ और सदन संचालन की जिम्मेदारी का पद है।
सूत्रों के अनुसार, अगर इस बार भी वर्षों से संगठन में मेहनत कर रही, कई बार चुनाव जीत चुकी नगरसेविकाओं को नज़रअंदाज़ किया गया, तो यह संदेश जाएगा कि संघर्ष और अनुभव से ज़्यादा व्यक्तिगत नज़दीकियां अहम हैं। यही वजह है कि पार्टी के अंदर दबे स्वर में असंतोष की चर्चाएं भी शुरू हो चुकी हैं।
नागपुर मनपा में कई महिला नगरसेविकाएं ऐसी हैं जो
• कई बार चुनाव जीत चुकी हैं
• वर्षों से संगठन के लिए निष्ठा से काम कर रही हैं
• और ज़मीन पर जनता से सीधा जुड़ाव रखती हैं
अब भाजपा के सामने सीधा सवाल—
क्या नागपुर में अनुभवी और ज़मीनी नेतृत्व को मौका मिलेगा?
या फिर एक बार फिर “करीबी है, भरोसेमंद है” यही पैमाना निर्णायक बनेगा?