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ऑपरेशन ‘किडनी’: चंद्रपुर पुलिस का ‘मास्टरस्ट्रोक’, दिल्ली से तमिलनाडु तक हड़कंप; अब कंबोडिया पर नजर

– नागभीड़ के एक किसान की मजबूरी से शुरू हुई जांच, जो जा पहुंची अंतरराष्ट्रीय अंडरवर्ल्ड की दहलीज तक। साहूकारों के चंगुल से छूटी पुलिस की तीर ने भेदे सात समुंदर पार के राज।

सुशांत घाटे,चंद्रपुर :- चंद्रपुर पुलिस की यह कार्रवाई इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रही है। नागभीड़ तालुका के एक छोटे से गाँव से उठी चिंगारी ने आज दिल्ली और चेन्नई के फाइव स्टार अस्पतालों की नीवें हिला दी हैं।

इस खौफनाक साजिश की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब नागभीड़ पुलिस और स्थानीय अपराध शाखा ने अवैध साहूकारी के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी। एक गरीब किसान, जो कर्ज के बोझ तले इस कदर दब चुका था कि उसे सांस लेना भी दूभर हो रहा था। साहूकारों का तकादा इतना जानलेवा था कि उस किसान के पास अपनी इज्जत बचाने का कोई रास्ता नहीं बचा था।

तभी उसे एक ‘ऑफर’ मिला। एक ऐसा ऑफर जो देखने में तो जीवनदान लग रहा था, लेकिन असल में वह मौत का सौदा था।

 “अपना कर्ज चुकाना है? तो अपनी किडनी दे दो।”

मजबूरी इंसान से क्या नहीं करवाती। किसान तैयार हो गया। उसे लगा कि यह एक गुप्त समझौता है, लेकिन उसे अंदाजा नहीं था कि वह जिस दलदल में पैर रख रहा है, वह अंतरराष्ट्रीय माफिया का एक बिछाया हुआ जाल है।

जब यह मामला पुलिस के संज्ञान में आया, तो एसपी (SP) मुमक्का सुदर्शन और उनकी टीम को आभास हो गया कि यह मामला केवल अवैध ब्याज-वसूली का नहीं है। यह उससे कहीं ज्यादा गहरा, काला और वीभत्स है। पुलिस ने जब उस किसान की ‘किडनी डोनेशन’ की फाइल खंगाली, तो उसमें लगाए गए दस्तावेज फर्जी निकले। यहीं से पुलिस को वह सुराग मिला, जिसने ‘ऑपरेशन किडनी’ की नींव रखी।

 ‘ऑपरेशन साइलेंट’ और एसआईटी का गठन

मामले की गंभीरता को देखते हुए चंद्रपुर पुलिस ने तुरंत एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। इस ऑपरेशन को बेहद गुप्त रखा गया।

पुलिस की तकनीकी टीम ने जब मोबाइल टावरों का डेटा डंप निकाला और संदिग्धों की कॉल डिटेल्स खंगाली, तो नक्शे पर लाल रंग की बत्तियां जलने लगीं। यह गिरोह महाराष्ट्र तक सीमित नहीं था। इसके तार सोलापुर और मोहाली से होते हुए सीधे देश की राजधानी दिल्ली और दक्षिण भारत के गढ़ तमिलनाडु तक जा रहे थे।

पुलिस समझ गई कि वे किसी छोटे-मोटे दलाल के पीछे नहीं, बल्कि एक ‘ऑर्गेनाइज्ड क्राइम सिंडिकेट’ के पीछे हैं। यह गिरोह कॉर्पोरेट अंदाज में काम कर रहा था—एजेंट अलग, दस्तावेज बनाने वाले अलग, और सर्जरी करने वाले डॉक्टर अलग।

सफ़ेद कोट में छिपे ‘कसाई’ – दो बड़ी गिरफ्तारियां!

पिछले सप्ताह चंद्रपुर पुलिस की दो अलग-अलग टीमें हवाई मार्ग से दिल्ली और तमिलनाडु के लिए रवाना हुईं। स्थानीय पुलिस के सहयोग से, उन्होंने जाल बिछाया।

तमिलनाडु कनेक्शन: एक टीम ने तमिलनाडु के भिलाई नगर में दबिश दी। वहां से डॉ. राजरत्नम गोविंदस्वामी को हिरासत में लिया गया। यह नाम दक्षिण भारत के मेडिकल जगत में जाना-पहचाना था, लेकिन पुलिस की जांच में यह ‘सरगना’ के रूप में उभरा।

दिल्ली कनेक्शन: ठीक उसी समय, दूसरी टीम ने दिल्ली में डॉ. रविंद्रपाल सिंह को दबोच लिया।

ये दोनों डॉक्टर कोई साधारण अपराधी नहीं थे। ये वे लोग थे जिन्होंने चिकित्सा की शपथ ली थी, लेकिन चंद रुपयों की खातिर इन्होंने अपने हुनर को ‘अपराध’ में बदल दिया। जांच में सामने आया कि ये डॉक्टर गरीब डोनर्स की किडनी निकालकर अमीर जरूरतमंदों को ऊंचे दामों पर ट्रांसप्लांट करते थे। इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती थीं और फर्जी कागजातों का सहारा लिया जाता था।

कंबोडिया का खौफनाक एंगल – क्या विदेश से चल रहा है रिमोट?

डॉक्टरों की गिरफ्तारी तो महज हिमशैल का ऊपरी सिरा है। पुलिसिया पूछताछ में जो खुलासे हो रहे हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं।

चंद्रपुर पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस रैकेट के तार श्रीलंका से जुड़े होने के पुख्ता सबूत मिले हैं। कई मामलों में डोनर्स या मरीजों को श्रीलंका ले जाकर सर्जरी की संभावनाओं की जांच की जा रही है। लेकिन सबसे चौंकाने वाला नाम जो सामने आ रहा है, वह है—कंबोडिया।

जांच अधिकारियों को शक है कि इस पूरे गिरोह का ‘किंगपिन’ (मुख्य सरगना) भारत में नहीं, बल्कि कंबोडिया में बैठा हो सकता है। हाल के दिनों में कंबोडिया ‘साइबर क्राइम’ और ‘ह्यूमन ट्रैफिकिंग’ का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। आशंका है कि:

भारत से डेटा कंबोडिया भेजा जाता था।

वहां बैठे आका तय करते थे कि किस डोनर की किडनी किसे और कितने में बेची जाएगी।

हवाला के जरिए पैसों का लेनदेन होता था।

चंद्रपुर पुलिस के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे कंबोडिया तक अपने हाथ बढ़ा पाएंगे? क्या इंटरपोल के जरिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जाएगा? यह अब एक जिला स्तरीय केस नहीं रहा, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय मिशन बन चुका है।

चंद्रपुर पुलिस की ‘ऐतिहासिक’ उपलब्धि

आज तक के इतिहास में बहुत कम ऐसा हुआ है जब किसी जिले की पुलिस ने बिना सीबीआई (CBI) या एनआईए (NIA) की मदद के, अपने दम पर इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश किया हो।

सटीक खुफिया तंत्र: अवैध साहूकारी से शुरू होकर किडनी रैकेट तक पहुंचना पुलिस की ‘डिटेक्टिव’ सोच को दर्शाता है।

समन्वय दिल्ली और तमिलनाडु पुलिस के साथ मिलकर, भाषा और क्षेत्र की बाधाओं को पार करते हुए ऑपरेशन को अंजाम देना काबिले तारीफ है।

एसपी और उनकी टीम ने यह साबित कर दिया है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो पुलिस के लिए कोई भी अपराधी, चाहे वह सात समुंदर पार क्यों न बैठा हो, पहुंच से दूर नहीं!

मोडस ऑपरेंडी: कैसे काम करता था मौत का यह बाज़ार?

पुलिस जांच में इस गिरोह के काम करने का तरीका बेहद शातिर पाया गया है:

एजेंट गांवों में जाकर कर्ज में डूबे किसानों और गरीबों को निशाना बनाते थे।

उन्हे समझाया जाता था कि एक किडनी के बिना भी इंसान सामान्य जी सकता है और बदले में मोटा पैसा मिलेगा।

कानूनन किडनी केवल करीबी रिश्तेदार ही दे सकते हैं। इसलिए यह गिरोह डोनर और मरीज के बीच फर्जी रिश्तेदारी के दस्तावेज (आधार कार्ड, राशन कार्ड) तैयार करता था।

सर्जरी गुपचुप तरीके से नहीं, बल्कि बड़े शहरों के नामी अस्पतालों में (डॉक्टरों की मिलीभगत से) की जाती थी ताकि किसी को शक न हो।

डॉ. राजरत्नम और डॉ. रविंद्रपाल की गिरफ्तारी ने इस गिरोह की कमर तोड़ दी है, लेकिन सिर अभी भी बाकी है। पुलिस अब डॉक्टरों की ‘चेन’ को डिकोड करने में जुटी है। उनके मोबाइल, लैपटॉप और बैंक खातों की फॉरेंसिक जांच की जा रही है।

सवाल यह है कि क्या चंद्रपुर पुलिस की टीम कंबोडिया जाएगी? क्या आने वाले दिनों में और भी बड़े “सफ़ेदपोश” चेहरे बेनकाब होंगे?

चंद्रपुर की जनता अपनी पुलिस की इस कार्रवाई पर गर्व महसूस कर रही है। यह केवल एक अपराध का खुलासा नहीं है, बल्कि उन हजारों गरीब किसानों के लिए न्याय की उम्मीद है, जिन्हें अमीरों की जान बचाने के लिए ‘स्पेयर पार्ट्स’ की दुकान समझ लिया गया था।


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