◾रोग नियंत्रण, उर्वरक और कीटनाशक छिड़काव को आसान बनाया गया
◾सूर्य की रोशनी का पूरा लाभ
सचिन चौरसिया, रामटेक :- पट्टा विधि से धान की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इसके अलावा, रोग नियंत्रण और उर्वरक एवं कीटनाशकों का छिड़काव आसान हो जाता है। फसल को सूर्य की रोशनी का पूरा लाभ मिलता है। इसलिए, कृषि विभाग ने खरीफ ऋतु में पारंपरिक धान की खेती के बजाय नई तकनीकों का उपयोग करने की अपील की है। कुछ क्षेत्रों में किसानों के बीच पट्टा पद्धति का उपयोग करके धान की खेती करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इसकी उपेक्षा की जा रही है। पट्टा विधि का उपयोग करने से रोगों पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। कीटनाशकों का छिड़काव आसान हो जाता है। फसल को सूर्य की रोशनी का पूरा लाभ मिलता है। चावल के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसलिए, पारंपरिक लागतों को कम करके स्थायी आय प्राप्त करने के लिए चावल की खेती में पट्टा पद्धति का उपयोग करने की अनुशंसा की जाती है। यह अपील तालुका कृषि अधिकारी सुनील कोरटे और मंडल कृषि अधिकारी पी. एम. मेश्राम ने की है। खोदगांव के प्रगतिशील किसान काशीनाथ डफ ने कहा कि यह विधि रोग और कीट नियंत्रण, छिड़काव कार्य और पौध प्राप्त करने में निश्चित रूप से लाभदायक है। यह विधि धान की खेती के लिए उपयोगी है।
🔹पट्टा पद्धति क्या है?
धान की बुवाई करते समय या बुवाई के बाद, लगभग २ मीटर या १० से १२ पंक्तियों के बाद, २० से २५ सेमी (१ फुट) खाली पट्टा छोड़ देना।
🔹पट्टा विधि के मुख्य लाभ
▪️फसल को हवा का संचार मिलता है :- सूर्य की रोशनी फसल के आधार तक पहुँचती है। पौधों की वृद्धि जोरदार होती है।
▪️रोग और कीट नियंत्रण :- फसलें घनी नहीं होतीं। वायु संचार से रोगों और कीटों का प्रकोप कम होता है।
▪️खाद और कीटनाशकों का प्रयोग आसान:- पट्टियों के बीच एक निश्चित दूरी रखने से खाद डालना, कीटनाशकों का छिड़काव करना और खरपतवार हटाना आसान हो जाता है।
▪️अधिक अंकुरण:- खुली जगह होने से फसल में अधिक अंकुरण होता है।
जिससे उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है।
▪️श्रम लागत में बचत :- श्रम पर होने वाली अतिरिक्त लागत कम हो जाती है।
▪️उचित जल नियोजन :- भारी वर्षा की स्थिति में पानी की निकासी और आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई करना आसान हो जाता है।








