– देव अग्रवाल के डिपो पर महाजेनको के कोयले की सरेआम नीलामी।
– महाजेनको में कोयला नहीं, ‘काला खेल’ पक रहा: गुप्ता कोल वॉशरी और देव अग्रवाल के सिंडिकेट ने सरकार को लगाया अरबों का चूना!
चंद्रपूर :- सरकारी तिजोरी को दीमक की तरह चाटते भ्रष्टाचार के सौदागरों ने अब बिजली घरों की राख से अपना महल खड़ा करना शुरू कर दिया है। महाजेनको को होने वाली कोयला आपूर्ति में एक ऐसा रूह कंपा देने वाला घोटाला सामने आ रहा है, जिसने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। यह महज हेरा-फेरी नहीं, बल्कि राष्ट्र की संपत्ति पर सरेआम डकैती है। कोयला खदानों से वॉशरीज और वहां से बिजली घरों तक पहुँचने वाले इस ‘काले खेल’ का केंद्र बिंदु बनी है— गुप्ता कोल वॉशरी। विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो यहाँ कोयले की सफाई नहीं, बल्कि सरकारी साख की ‘सफाई’ की जा रही है।
वॉशरी तो सिर्फ बहाना है, असली खेल तो ‘धानोरा फाटा’ का ठिकाना है!
इस घोटाले की कार्यप्रणाली इतनी दुस्साहसी है कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएं। खदानों से अच्छी गुणवत्ता वाला कोयला ट्रकों में भरकर निकलता तो महाजेनको के लिए है, लेकिन रास्ते में पड़ने वाली गुप्ता कोल वॉशरी इस पूरे काले साम्राज्य का चेकपोस्ट बनी हुई है। सूत्र बताते हैं कि कोयले से लदे ट्रक वॉशरी के भीतर सिर्फ कागजी खानापूर्ति और ‘एंट्री’ के लिए जाते हैं। वहां कोयला धुलता नहीं, बल्कि सिर्फ घोटाले पर पर्दा डाला जाता है।
वॉशरी में नाममात्र की हाजिरी लगाकर ये ट्रक सीधे देव अग्रवाल के ‘धानोरा फाटा’ स्थित कोल डिपो की ओर कूच कर जाते हैं। वहां सरेआम, दिन के उजाले में महाजेनको का कीमती कोयला खाली किया जाता है और उसे खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेचकर चांदी काटी जा रही है। सवाल यह है कि सुरक्षा एजेंसियों और चेकपोस्ट की आंखों में धूल झोंककर रोजाना हजारों टन कोयला आखिर कैसे गायब हो रहा है?
लॉयड मेटल की ‘राख’ और महाजेनको का ‘विनाश’
घोटाले की परतें यहीं खत्म नहीं होतीं। एक तरफ असली कोयला बाजार में बेचा जा रहा है, तो दूसरी तरफ महाजेनको के बिजली घरों में क्या भेजा जा रहा है? इसका जवाब है— ‘रिजेक्ट कोल’ (घटिया कचरा)। हैरानी की बात यह है कि गुप्ता कोल वॉशरी को लॉयड मेटल कंपनी से भारी मात्रा में रिजेक्ट कोल और राख लेने की क्या मजबूरी है? रोजाना करीब 100 ट्रक लॉयड मेटल से कचरा और राख लेकर वॉशरी में आवाजाही कर रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि इसी कचरे और राख को महाजेनको के असली कोयले के साथ मिलाकर या उसकी जगह खपाया जा रहा है। यानी सरकार पैसे दे रही है शुद्ध कोयले के, और उसे मिल रही है सिर्फ मिट्टी और राख! यह बिजली घरों की मशीनों को तबाह करने और उत्पादन लागत को आसमान पर पहुँचाने की एक सोची-समझी साजिश है।
अधिकारियों की ‘मौन सहमति’ या मोटी हिस्सेदारी?
इतने बड़े पैमाने पर हो रहे इस गोरखधंधे ने महाजेनको के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी कालिख पोत दी है। बिना अधिकारियों की ‘साठगांठ’ के खदान से लेकर वॉशरी और फिर देव अग्रवाल के डिपो तक का यह त्रिकोण पूरा होना नामुमकिन है। क्या महाजेनको के जिम्मेदार अधिकारी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर अरबों के इस घोटाले का तमाशा देख रहे हैं? या फिर इस भ्रष्टाचार की बहती गंगा में वे खुद भी डुबकी लगा रहे हैं?
गुप्ता कोल वॉशरी का यह कारनामा अब ‘बेखौफ सन्नाटे’ को चीरते हुए सड़कों पर चर्चा का विषय बन गया है। कोयले की राख के साथ अरबों का काला धन व्यापारियों के अड्डों में समा गया है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक सिफर ही हाथ लगा है।
CBI की एंट्री का इंतजार: कब टूटेगा यह सिंडिकेट?
इस महा-घोटाले ने पूरे सिस्टम को चुनौती दे दी है। अब जनता और ईमानदार तबका यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर CBI और ED जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियां इस ‘कोयला माफिया’ के गिरेबान तक कब पहुँचेंगी? देव अग्रवाल जैसे रसूखदार व्यापारियों और गुप्ता कोल वॉशरी के संचालकों के गठबंधन ने सरकार को जो चूना लगाया है, उसकी भरपाई कब होगी?
यह खबर उन सफेदपोश लुटेरों के लिए एक चेतावनी है जो समझते हैं कि वे कानून की पहुंच से दूर हैं। कोयले की कालिख अब इनके चेहरों पर साफ नजर आने लगी है। अगर जल्द ही इस पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब महाराष्ट्र के बिजली घर कोयले की कमी से नहीं, बल्कि इस भ्रष्टाचार की राख तले दबकर दम तोड़ देंगे।
खदान से निकला कोयला वॉशरी में सिर्फ ‘शो-पीस’ बनकर रह गया।
देव अग्रवाल के डिपो पर महाजेनको के कोयले की सरेआम नीलामी।
लॉयड मेटल का ‘कचरा’ महाजेनको की सप्लाई चेन में शामिल।
अरबों के घोटाले में महाजेनको के अफसरों पर भी संदेह की सुई।



