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351 करोड़ का ‘लावारिस’ खजाना

– नागपुर ईपीएफओ के पास वर्षों से निष्क्रिय पड़ी 351.11 करोड़ से ज़्यादा की रकम ; हाईकोर्ट ने मांगा हिसाब

– अगली सुनवाई 10 दिसंबर को

नागपुर :- बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ में एक रिट याचिका से खुलासा हुआ है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) नागपुर के पास 351 करोड़ 11 लाख रुपए से ज्यादा की रकम वर्षों से निष्क्रिय पड़ी है। यह पैसा नियोक्ताओं से ती बसूला गया था, लेकिन कर्मचारी नहीं मिलने के कारण किसी को बांटा नहीं जा सका, इसलिए कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज कर लिया। हालिया सुनवाई में न्यायालय मित्र ने दावा किया कि ईपीएफओ ने नियोक्ताओं से तो पैसे वसूल लिए, लेकिन कर्मचारियों का पता ही नहीं लगा पाया। ऐसी राशि हजारों करोड़ रुपए की हो चुकी है। इस पर कोर्ट ने सहायक भविष्य निधि आयुक्त, नागपुर को आदेश दिया कि निष्क्रिय खातों में पड़े इन करोड़ों रुपए की उपयोगिता 10 दिसंबर तक स्पष्ट करें।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन क्षेत्रीय कार्यालय नागपुर बता दें कि उक्त रिट याचिका में सहायक भविष्य निधि आयुक्त के 29 जनवरी 2016 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता कौशिक के. चटजीं इंजीनियर्स एंड कॉट्रक्टर्स पर 2008-09 से 2014-15 तक का 1 करोड़ 45 लाख 75 हजार 337 रुपए पीएफ बकाया तय किया गया और 15 दिन में जमा करने को कहा गया। रकम नहीं जमा करने पर धारा 8-बी और 8-एफ के तहत जबरन वसूली की चेतावनी दी गई। तत्कालीन न्यायमूर्ति आर. के. देशपांडे ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पाया कि ईपीएफओ बिना किसी कर्मचारी का नाम-पता पता किए ही ठेकेदारों से 15 फीसदी अनुमानित राशि वसूल लेता है, फिर उस पर भारी ब्याज व जुर्माना जोड़कर बैंक खाते फ्रीज कर देता है।

कर्मचारी भविष्य निधि यह पैसा नियोक्ताओं से वसूला गया है जबरन वसूली की चेतावनी दी गई यह तो गैरकानूनी है कोर्ट ने सहायक पीएफ आयुक्त को तलब किया था। सुनवाई के दौरान आयुक्त ने माना था कि ईपीएफओ के खाते में 351 करोड़ रुपए ‘अनकडेड’ हैं। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना कर्मचारी पहचान के धारा 7-ए के तहत बकाया तय करना पूरी तरह गैर-वाळूती है। कर्मचारी ढूंढ़ना और सबूत जुटाना पीएफ विभाग का काम है, निवेवता का नहीं। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि कमिश्नर को सिविल कोर्ट जैसे अधिकार है, उनका इस्तेमाल करना उसकी कानूनी जिम्मेदारी है। ठेकेदार को दी गई राशि का 15% सीये पीएफ मानना गलत है। असल बेसिक वेतन पर ही 10 फीसदी गणना होनी चाहिए।

कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लिया: कोर्ट ने सबसे बड़ा सवाल उठाया था कि अगर सालों तक कर्मचारी नहीं मिले, तो यह करोड़ों रुपए नियोक्ताओं को व्याज सहित वापस होना चाहिए या नहीं।

जबरन वसूली पर उठे सवाल

उसके बाद कोर्ट ने पूरे मामले को स्वयं संज्ञान लेकर जन‌हित याचिका मानते हुए इसे डिवीजन बेंच के सामने भेज दिया, जिसमें निष्क्रिय खाते में पड़े करोड़ों रुपए का क्या होगा, आगे बिना नाम-पते के वसूली रोकी जाएगी, अनक्लेम्ड राशि नियोक्ताओं को लौटाई जाएगी और धारा 8-एफ से जबरन वसूली पर सख्ती होगी? इन मुद्दों पर अंतिम फैसला होगा बाकी है। इस जनहित याचिका पर हाल ही में न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की पीठ के समक्ष हुई सुनवाई में अदालत ने उक्त आदेश जारी किए। अब 10 दिसंबर को मामले पर अगली सुनवाई होगी। न्यायालय मित्र के रूप में एड. अतुल पाठक ने पैरवी की।


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