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7 पुलिस कर्मियों पर गिरेगी गाज

– हाई कोर्ट का सख्त रुख

नागपुर :- फर्जी रिकॉर्ड बनाकर फंसाने का आरोप करते हुए मोहित शाहू की ओर से हाई कोर्ट में फौजदारी रिट याचिका दायर की गई जिस पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए 7 पुलिस कर्मियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि इन पुलिस कर्मियों ने न केवल कानून का उल्लंघन किया बल्कि गिरफ्तारी की तारीखों में हेरफेर कर झूठे रिकॉर्ड भी तैयार किए.सीसीटीवी फुटेज ने खोली पुलिस के झूठ की पोल : अदालत के अनुसार याचिकाकर्ता को 25 फरवरी 2019 को कांजी हाउस चौक से हिरासत में लिया गया था जिसकी पुष्टि सीसीटीवी फुटेज से हुई है. इसके विपरीत पुलिस ने आधिकारिक स्टेशन डायरी और एफआईआर में गिरफ्तारी की तारीख 26 फरवरी 2019 दिखाई जो पूरी तरह से गलत साबित हुई. गिरफ्तारी के दिन स्टेशन डायरी में कोई प्रविष्टि नहीं की गई थी और याचिकाकर्ता को उसकी गिरफ्तारी के कारण भी नहीं बताए गए थे. इन पुलिस कर्मियों के खिलाफ होगी कार्रवाई अशोक मारोती मेश्राम (पुलिस निरीक्षक) तुलसीराम माणिकराव धकुलकर (पुलिस उप निरीक्षक) राज चौधरी, गजानन निशितकर, सचिन सोनावणे, विजय लांडे और संजय गिते (सभी पुलिस कांस्टेबल)

मौलिक अधिकारों-नियमों का उल्लंघन

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है. साथ ही पुलिस ने फौजदारी प्रक्रिया संहिता की धारा 165 और 166 और बॉम्बे पुलिस मैनुअल के अनिवार्य नियमों की अनदेखी की. अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस सिपाहियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर गिरफ्तारी और तलाशी ली, जबकि कानूनन यह अधिकार केवल पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी (जो सिपाही से ऊपर के पद का हो) के पास होता है.

आंतरिक जांच को बताया खानापूर्ति

कोर्ट ने पुलिस विभाग द्वारा पहले की गई आंतरिक जांच को केवल खानापूर्ति करार दिया जिसका उद्देश्य दोषी कर्मियों को बचाना था. अदालत ने कहा कि पीएसआई को केवल तबादले की सजा देना इतने गंभीर अपराध के लिए नाकाफी है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ सभी आपराधिक मामलों को रद्द कर दिया है क्योंकि वे अवैध गिरफ्तारी पर आधारित थे. इसके अलावा कोर्ट ने प्रामाणिक विश्वास व्यक्त किया कि राज्य सरकार और पुलिस आयुक्त इन दोषियों के खिलाफ उचित विभागीय कार्यवाही करेंगे. याचिकाकर्ता को इन पुलिस कर्मियों के खिलाफ नुकसान भरपाई के लिए कानूनी रास्ता अपनाने की अनुमति भी दी गई है.


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