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संपादकीय – लोकतंत्र की चोरी या राजनीतिक शोर ?

– अगर न्याय समय पर न मिले तो वह अन्याय है

बेगलुरू :- कर्नाटक के आलंद से उठी राहुल गांधी की गूंज – ‘6०18 वोट चोरी हो गए’ – ने लोकतंत्र की बुनियाद को चुनौती देने वाला सवाल खड़ा कर दिया है. यह मामला केवल एक चुनावी गड़बड़ी या नेता का राजनीतिक बयान भर नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है. क्योंकि यदि सचमुच 15 मिनट में दो-दो बार फॉर्म भरकर मतदाताओं के नामकाटे गए, तो इसे तकनीकी चूक कहना लोकतंत्र के साथ मज़ाक होगा. यह तो सुनियोजित डिजिटल छल होगा, जिसके दुष्परिणाम केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं रहेंगे. भारत का चुनाव आयोग लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है. उसकी साख और निष्पक्षता ही इस देश की सबसे बड़ी ताकत रही है. लेकिन जब बार-बार मतदाता सूची से नाम कटने, गलत पते पर ट्रांसफर होने या फर्जी नाम जुडऩे जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह प्रहरी सो तो नहीं रहा ? राहुल गांधी का यह आरोप नया नहीं, बल्कि पुराना घाव कुरेदने जैसा है. फर्क बस इतना है कि अब इस बहस में तकनीक का हस्तक्षेप और सॉफ्टवेयर आधारित धांधली जैसे आरोप भी जुड़ गए हैं. चिंता का विषय यह भी है कि राहुल गांधी ने इसे ‘लोकतंत्र की चोरी और ‘डिजिटल हत्या’ कहकर युवाओं को सीधा संबोधित किया है. उन्होंने नेपाल के जेन-जेड आंदोलन का हवाला देकर यह संकेत दिया कि भारत की नई पीढ़ी भी सडक़ों पर उतर सकती है. सच है कि आज का युवा सवाल करने से नहीं डरता और सोशल मीडिया उसकी आवाज़ को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचा देता है. यदि चुनावी प्रक्रिया पर से भरोसा उठता है, तो यह आक्रोश केवल विपक्ष की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक सामाजिक असंतोष का रूप ले सकता है.

दूसरी ओर, सत्ता पक्ष यानी बीजेपी इस पूरे प्रकरण को ‘निराधार’ बताकर कांग्रेस की हार का बहाना मान रही है. यह राजनीति का स्वाभाविक खेल है कि आरोप-प्रत्यारोप हों. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हर गंभीर मुद्दे को राजनीतिक बयानबाजी में दबा देना चाहिए ? क्या लोकतंत्र का तकाज़ा नहीं कि इन आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच हो ? दरअसल, चुनावलोकतंत्र की रीढ़ हैं. लेकिन रीढ़ तभी मजबूत रह सकती है जब उस पर विश्वास अडिग हो. यदि जनता यह मानने लगे कि चुनावी प्रक्रिया सत्ता और तकनीक की मिलीभगत से नियंत्रित हो रही है, तो लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा. यह खतरनाक संकेत है, क्योंकि लोकतंत्र का सार ही नागरिकों की समान भागीदारी और स्वतंत्र विकल्प में निहित है. इस पूरे विवाद का एक और पहलू है- तकनीक पर बढ़ती निर्भरता. वोटर लिस्ट के डिजिटलीकरण से लेकर मतदान मशीनों तक, तकनीक ने चुनावों को आसान और तेज़ जरूर बनाया है, लेकिन उसके साथ पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर संदेह भी बढ़े हैं. यदि सॉफ्टवेयर या डेटा एंट्री की त्रुटियाँ जानबूझकर की जाती हैं, तो यहलोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग को केवल प्रशासनिक सतर्कता ही नहीं, बल्कि तकनीकी पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी. लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का औपचारिक अभ्यास नहीं है, बल्कि हर नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका वोट सुरक्षित और गिना जाएगा. यदि एक भी मतदाता यह मानने लगे कि उसकी आवाज़ बेकार चली गई, तो लोकतांत्रिक तंत्र का आधार ही डगमगाने लगेगा.


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