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क्या 40 लोग अपने नगरसेवक पद खो देंगे?

– भाजपा के गढ़ में बड़ी हलचल

नागपुर :- नगर निगम चुनाव के नतीजे 16 जनवरी को घोषित कर दिए गए हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने मुंबई समेत कई नगर निगमों में सत्ता हासिल कर ली है। लेकिन एक नगर निगम में भाजपा को बड़ा झटका लगने की संभावना है। यहां 40 नगरसेवकों पर अयोग्यता का खतरा मंडरा रहा है। अगले 48 घंटों में उनके नगरसेवक पद छिन सकते हैं और वहां दोबारा उपचुनाव कराने पड़ सकते हैं।

नागपुर नगर निगम चुनाव में चुने गए नगरसेवकों को इससे बड़ा झटका लगने की संभावना है। यहां की 151 सीटों के लिए मतदान 15 जनवरी को हुआ था। मतदान के दूसरे दिन, 16 जनवरी को नतीजे घोषित किए गए। इन नतीजों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 151 सीटों में से भाजपा के 102 पार्षद निर्वाचित हुए। कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही। कांग्रेस के 35 नगरसेवक निर्वाचित हुए। इसके बाद मुस्लिम लीग (एमआईएम) के 6, मुस्लिम लीग के 4, ठाकरे समूह के 2, अजीत पवार समूह के 1-1 नगरसेवक और बसपा के 1 नगरसेवक निर्वाचित हुए। अब इसी नगर निगम के 40 नगरसेवकों पर अयोग्यता का खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में हुए नागपुर नगर निगम चुनाव के बाद से राजनीतिक गलियारों में काफी हलचल मची हुई है। ओबीसी आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा पार हो जाने के कारण, चुने गए 40 ओबीसी नगरसेवकों की सदस्यता खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए, इन सीटों पर उपचुनाव होंगे या नहीं, या अदालत ‘अपवाद’ के रूप में राहत देगी या नहीं, इस पर फैसला दो दिनों में यानी 21 जनवरी को होने वाली सुनवाई में लिया जाएगा।

आरक्षण की सीमाएँ और कमियाँ

नागपुर नगर निगम में ओबीसी वर्ग से 40 नगरसेवक चुने गए हैं। हालांकि, यह देखा गया है कि कुल आरक्षण प्रतिशत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक है। न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और जे. के. माहेश्वरी के 2021 के ऐतिहासिक फैसले के आधार पर, आरक्षण सीमा से अधिक सीटों पर चुनाव रद्द किए जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो नागपुर और चंद्रपुर दोनों नगर निगमों में समीकरण पूरी तरह से बदल सकते हैं।

राज्य की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

कुछ कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अदालत नागपुर की 40 सीटों के चुनाव रद्द कर देती है, तो इसका असर पूरे महाराष्ट्र में महसूस होगा। राज्य की कई अन्य नगर परिषदों और नगर पंचायतों में भी ओबीसी आरक्षण रद्द करके नए सिरे से चुनाव कराने का समय आ सकता है। यह स्थिति प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बेहद जटिल होगी।

हालांकि, विशेषज्ञों का एक समूह यह भी अनुमान लगा रहा है कि चूंकि चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और प्रशासनिक तंत्र पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए, अदालत इन चुनावों को “एक बार के अपवाद” के रूप में वैध घोषित कर सकती है। हालांकि, भविष्य के चुनावों के लिए आरक्षण सीमाओं का सख्ती से पालन करने के लिए कड़े आदेश जारी किए जा सकते हैं।

सुनवाई पर पूरा ध्यान

अब पूरे राज्य की निगाहें ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ पर टिकी हैं। 21 जनवरी को आने वाला फैसला न केवल नागपुर के 40 नगरसेवक का भविष्य तय करेगा, बल्कि राज्य में स्थानीय निकायों में आरक्षण की भविष्य की दिशा भी स्पष्ट करेगा।

नागपुर नगर निगम में आरक्षण की स्थिति

ओबीसी : 40

अनुसूचित जनजातियाँ : 12

अनुसूचित जाति: 30

सामान्य समूह: 69

कुल सीटें: 151

कुल आरक्षण: 54.30

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