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महाघोटाला: महाजेनको की चिमनियों से कोयला नहीं, जनता का पैसा ‘राख’ बनकर उड़ रहा है!

नागपूर /चंद्रपूर :- प्रदेश के पावर प्लांट्स में कोयले की सप्लाई के नाम पर एक ऐसा काला अध्याय लिखा जा रहा है, जिसकी स्याही भ्रष्टाचार के दलदल से निकलती है। कोल वॉशरीज के नाम पर ‘सफेदपोश माफियाओं’ का एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है, जो सरकारी तिजोरी को दीमक की तरह चाट रहा है। महाजेनको को मिलने वाला कोयला महज कागजों पर ‘उच्च श्रेणी’ का है, हकीकत में यह राख और पत्थरों का ऐसा मेल है जिसने बिजली उत्पादन को रसातल में धकेल दिया है।

वॉशरीज या ‘मिलावट की फैक्ट्रियां’?

विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि कोल वॉशरीज अब कोयला साफ करने का केंद्र नहीं, बल्कि ‘माल बदलने’ के अड्डों में तब्दील हो चुकी हैं। खदानों से निकला उच्च गुणवत्ता वाला ‘GCV’ (Gross Calorific Value) वाला कोयला, जिसे औद्योगिक बाजार में ‘ब्लैक गोल्ड’ कहा जाता है, वॉशरीज के पिछले दरवाजे से खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेच दिया जाता है।

इसके बदले, महाजेनको के बिजली घरों को जो माल भेजा जा रहा है, उसमें सिर्फ 15% असली कोयला होता है। बाकी का 85% हिस्सा मिट्टी, पत्थर और वह संदिग्ध राख होती है, जो पर्यावरण और मशीनों दोनों को बर्बाद कर रही है।

लॉयड मेटल की 100 गाड़ियां: आखिर मंज़िल कहाँ?

इस खेल का सबसे सनसनीखेज पहलू लॉयड मेटल से निकलने वाली राख (Reject/Ash) का रहस्यमयी परिवहन है। बताया जा रहा है कि रोजाना करीब 100 भारी वाहन (ट्रक/ट्रेलर) राख लोड करके निकलते हैं। बड़ा सवाल यह है कि यह ‘वेस्ट मटेरियल’ जा कहाँ रहा है? सूत्रों का इशारा है कि यह राख सीधे उन वॉशरीज के स्टॉक में मिलाई जा रही है, जहां से महाजेनको को सप्लाई होती है।

क्य कोयले के वजन को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए इस राख का ‘लेप’ चढ़ाया जा रहा है?

क्या सरकारी लैब के अधिकारी आंखें मूंदकर इस ‘मिट्टी’ को कोयला प्रमाणित कर रहे हैं?

करोड़ों की लूट और ‘मगरमच्छों’ का रसूख

यह घोटाला कोई लाख-दो लाख का नहीं, बल्कि हर महीने सैकड़ों करोड़ों का है। मिलावटखोरों ने अब तक प्रदेश की जनता और सरकार को अरबों की चपत लगाई है। इन ‘बड़े मगरमच्छों’ में कुछ रसूखदार ट्रांसपोर्टर्स, वॉशरीज संचालक और विभाग के वे आला अधिकारी शामिल हैं, जिनकी जेबें इस कोयले की कालिख से गर्म हो रही हैं।

मार्च का ‘खेल’ और रिन्यूअल की बिसात

वर्तमान कोयला टेंडरों की समय सीमा मार्च में खत्म हो रही है। अब इन दागी वॉशरीज और माफियाओं की नजर टेंडरों के नूतनीकरण (Renewal) पर है। चर्चा है कि रिन्यूअल की फाइलों को ‘विशेष वजन’ के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि अगले साल भी यह लूट बेधड़क जारी रहे।

सवाल सीधा है: क्या महाजेनको के तकनीकी विशेषज्ञों को कोयले और राख का फर्क समझ नहीं आता? या फिर वे भी इस मलाईदार बंदरबांट का हिस्सा हैं? मार्च से पहले अगर इन वॉशरीज की औचक जांच नहीं हुई और इनके लाइसेंस रद्द नहीं किए गए, तो प्रदेश में बिजली का संकट गहराना तय है।

प्रमुख बिंदु जिन पर उठ रहे सवाल:

गुणवत्ता का कत्ल: 15% कोयला बनाम 85% कचरा—यह गणित किसके इशारे पर चल रहा है?

राख का रहस्य: लॉयड मेटल से निकलने वाली 100 गाड़ियों का ‘एंड-यूजर’ कौन है?

टेंडर फिक्सिंग: क्या मार्च में होने वाला रिन्यूअल सिर्फ पुराने

गुनहगारों को बचाने की कवायद है?

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