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मनपा को हाई कोर्ट का तगड़ा झटका

– ऑरेंज सिटी वाटर विवाद में मध्यस्थ को हटाने की याचिका खारिज

नागपुर :- हाई कोर्ट ने महानगर पालिका और नागपुर एनवायर्नमेंटल सर्विसेज लिमिटेड को बड़ा झटका देते हुए उनकी एक महत्वपूर्ण याचिका खारिज कर दी. अदालत ने ऑरेंज सिटी वाटर प्राइवेट लिमिटेड के साथ चल रहे विवाद में नियुक्त मध्यस्थ के अधिकार को समाप्त करने और उनकी जगह नए मध्यस्थ की नियुक्ति की मनपा की मांग को ठुकरा दिया. मनपा और NESL ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 14 और 15 के तहत यह याचिका दायर की थी. उनकी मुख्य शिकायत यह थी कि मध्यस्थ (सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए.के. सीकरी) द्वारा तय की गई फीस मनपा जैसे वैधानिक स्थानीय निकाय के लिए बहुत अधिक है. मनपा के वकील ने तर्क दिया कि यह फीस हाई कोर्ट (मध्यस्थों को देय फीस) नियम, 2018 की अनुसूची के अनुसार नहीं है.

सबसे अहम दलील यह दी गई कि मध्यस्थता की पहली सुनवाई के दौरान मनपा के वकीलों और उपस्थित अधिकारियों ने मनपा आयुक्त या NESL के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक से बिना पूर्व वित्तीय मंजूरी लिए ही इस फीस पर सहमति दे दी थी. मनपा ने मद्रास हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए दावा किया कि फीस के विवाद के कारण मध्यस्थ कानूनी रूप से अपना काम करने में असमर्थ हो गए हैं. इसलिए उन्हें हटाया जाना चाहिए.

ऑरेंज सिटी वाटर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने मनपा की इस याचिका का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि मध्यस्थता फीस सभी पक्षों की आपसी सहमति से तय की गई थी. उनका कहना था कि चूंकि फीस पर सहमति बन चुकी थी और उसे न्यायाधिकरण द्वारा रिकॉर्ड पर लिया जा चुका था, इसलिए मनपा अब एकतरफा तरीके से इस समझौते से पीछे नहीं हट सकती. ओसीडब्ल्यू के वकील ने इसे मध्यस्थता की कार्यवाही में देरी करने का मनपा का एक प्रयास बताया.

अधिकारियों की मौजूदगी में तय हुई थी फीस

अदालत ने फैसले में कहा कि प्रक्रियात्मक आदेश संख्या-01 के अनुसार मध्यस्थता फीस मनपा के सहायक विधि अधिकारी, कार्यकारी अभियंता और नेसल के कार्यकारी निदेशक तथा उनके वकीलों की सहमति से ही तय की गई थी. सुनवाई के दौरान किसी भी पक्ष ने फीस को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी और न ही उच्च अधिकारियों से मंजूरी लेने के लिए समय की मांग की थी. अदालत ने कहा कि आपसी सहमति से फीस तय होने के बाद 2018 के नियमों को लागू करने की मनपा की जिद पूरी तरह से अनुचित है. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कुछ भी साबित नहीं होता जिससे यह माना जाए कि मध्यस्थ अपना कार्य करने में असमर्थ हैं और मनपा ने मध्यस्थ पर से अपना विश्वास खोने जैसी कोई बात भी नहीं कही है.


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