– सरकार के फैसले पर उठे सवाल, कहा- नियमों से आम जनता कीसान और छोटे कारोबारियों को होगी परेशानी
यासीन शेख, गोंदिया गोरेगांव :- केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंधों को लेकर राज्य में विरोध के स्वर उठने लगे हैं। पेट्रोल पंप संचालकों, परिवहन व्यवसायियों, औद्योगिक संगठनों और आम उपभोक्ताओं ने सरकार के इस फैसले को अव्यावहारिक बताते हुए इसमें संशोधन की मांग की है।
सरकार ने जमाखोरी, कालाबाजारी और अवैध भंडारण रोकने के उद्देश्य से खुदरा पेट्रोल पंपों से संस्थागत और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को डीजल बिक्री पर रोक लगाई है तथा प्रति वाहन 200 लीटर तक डीजल बिक्री का प्रावधान किया है। हालांकि विरोध करने वालों का कहना है कि इस तरह के प्रतिबंधों से ईमानदार उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा वहीं सिंचाई क्षेत्र में भी इस आदेश बुरा असर देखा जा रहा है किसानों को इस समय सिंचाई के लिए ईंधन की आवश्यकता है परन्तु डीजल के पाबंदियों से फसलों की बुवाई में भी दिक्कत आ सकती है।
परिवहन क्षेत्र ने जताई चिंता
ट्रक, कंटेनर, बस और अन्य मालवाहक वाहन संचालकों का कहना है कि लंबे मार्गों पर चलने वाले वाहनों के लिए बार-बार ईंधन भरवाना व्यावहारिक नहीं है। उनका तर्क है कि बड़ी मात्रा में डीजल की आवश्यकता वाले परिवहन व्यवसाय को थोक केंद्रों तक जाने के लिए अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ेगा। परिवहन संगठनों ने मांग की है कि सरकार प्रतिबंध लागू करने से पहले जमीनी स्तर की समस्याओं का आकलन करे और ऐसी व्यवस्था बनाए जिससे आवश्यक सेवाओं से जुड़े वाहनों को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
पेट्रोल पंप संचालकों में भी नाराजगी
पेट्रोल पंप संचालकों का कहना है कि बिक्री रिकॉर्ड, ग्राहक विवरण और अतिरिक्त निगरानी जैसी व्यवस्थाओं से छोटे पंप संचालकों पर प्रशासनिक दबाव बढ़ेगा। उनका कहना है कि कालाबाजारी रोकने के लिए दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सभी उपभोक्ताओं पर एक समान प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है। कुछ संचालकों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि राज्य में पर्याप्त ईंधन उपलब्ध है तो सामान्य बिक्री व्यवस्था में इतनी सख्ती की आवश्यकता क्यों पड़ी।
उद्योग और व्यापार जगत ने मांगी राहत
औद्योगिक और व्यावसायिक संस्थानों ने कहा है कि कई छोटे उद्योग, निर्माण कार्य और अन्य व्यवसाय डीजल पर निर्भर हैं। खुदरा केंद्रों से खरीद पर रोक लगने से उत्पादन और कामकाज प्रभावित होने की आशंका है। व्यापारियों का कहना है कि सरकार को प्रतिबंध लगाने के बजाय निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए और जहां गड़बड़ी मिले, वहीं कार्रवाई करनी चाहिए।
आम नागरिकों ने भी जताई परेशानी की आशंका
कई नागरिकों का कहना है कि अचानक नियम बदलने से भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां थोक ईंधन केंद्र आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, वहां किसानों और छोटे वाहन मालिकों को अधिक परेशानी हो सकती है। किसानों का कहना है कि कृषि कार्यों के लिए समय पर डीजल उपलब्ध होना जरूरी है। यदि खरीद प्रक्रिया जटिल हुई तो खेती से जुड़े काम प्रभावित हो सकते हैं।
सरकार से आदेश वापस लेने या संशोधन की मांग
विरोध करने वाले संगठनों ने सरकार से मांग की है कि प्रतिबंधों की समीक्षा की जाए और ऐसे नियम बनाए जाएं जिनसे कालाबाजारी पर रोक भी लगे तथा सामान्य उपभोक्ताओं को परेशानी भी न हो। उनका कहना है कि प्रशासन को कार्रवाई का अधिकार जरूर मिलना चाहिए, लेकिन इसके साथ आम जनता, किसानों, परिवहन क्षेत्र और छोटे व्यापारियों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए फिलहाल सरकार की ओर से कहा गया है कि ये कदम अस्थायी हैं और इनका उद्देश्य ईंधन की उपलब्धता बनाए रखना है। वहीं विरोध करने वाले संगठनों ने मांग की है कि सरकार सभी पक्षों से चर्चा कर संतुलित समाधान निकाले।







