– ट्रम्प का यू-टर्न, भारत को राहत!
– भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45%
वॉशिंगटन, एजेंसी :- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने से जुड़े कानून को फिलहाल लागू नहीं करने का फैसला किया है। शुक्रवार को संबंधित आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए ट्रम्प ने कहा कि यह कदम अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। प्रस्तावित प्रावधानों के तहत भारत और चीन सहित कई देशों पर भारी आयात शुल्क लगाया जा सकता था। ऐसे में इस फैसले को भारत के लिए संभावित व्यापारिक राहत के रूप में देखा जा रहा है।
रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर अंकुश लगाने और यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध के लिए उसके आर्थिक संसाधनों को सीमित करने के उद्देश्य से यह कानून लाया गया था। इसके दायरे में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों को लाने का प्रस्ताव था। हालांकि, ट्रम्प प्रशासन ने फिलहाल इसे लागू करने से परहेज किया है। उल्लेखनीय है कि ट्रम्प ने 9 अक्टूबर को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ डीजल खरीदने से जुड़ी डील की थी।
30 दिन के भीतर लेना था फैसला
रूस पर प्रतिबंधों से संबंधित लिंडसे ग्राहम एक्ट पर ट्रम्प ने 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को विधेयक को 262 के मुकाबले 159 मतों से मंजूरी दी थी। कानून के तहत प्रतिबंधों को लेकर 30 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाना था। हालांकि, ट्रम्प ने समयसीमा पूरी होने से पहले ही टैरिफ और प्रतिबंधों के मामले में राहत देने का कदम उठाया।
भारत के लिए क्यों अहम है फैसला?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। अगस्त 2026 में देश के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45 प्रतिशत थी। इस दौरान भारत ने रूस से प्रतिदिन औसतन 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा। ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार पर असर डाल सकता था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तेल की उपलब्धता और वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच रूस से तेल की आपूर्ति घटने पर वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने का खतरा है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इसका सीधा असर पड़ सकता है। ऐसे में अमेरिका के सामने रूस पर दबाव बढ़ाने के साथ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को संतुलित रखने की चुनौती भी है।








