Home Latest News गणेशोत्सवाची पवित्रता राखा; हिंदू जनजागृती समितीची विविध मागणी

गणेशोत्सवाची पवित्रता राखा; हिंदू जनजागृती समितीची विविध मागणी

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नागपुर, २२ – महाराष्ट्र सहित संपूर्ण भारत तथा अनेक राष्ट्रों के करोड़ों हिन्दुओं की श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक एकात्मता का उत्सव अर्थात गणेशोत्सव। यह उत्सव इस वर्ष राज्य शासन ‘राज्य महोत्सव’ के रूप में मनाने जा रहा है। ‘राज्य महोत्सव’ का दर्जा भले ही दिया गया हो; किन्तु कुछ वर्षों से महानगरपालिका एवं नगरपालिकाएं गणेशमूर्ति विसर्जन के लिए घनकचरा गाड़ियों से लेकर जाते हुए दिखाई देती हैं; शासन अथवा संस्थाएं श्रद्धालुओं से मूर्ति ‘दान’ मांगते हैं; दान में प्राप्त मूर्तियों को कृत्रिम हौद में विसर्जन करने के उपरांत रौंदा जाता है, तथा विज्ञापन या उत्पाद विक्रय के लिए गणेशजी का विकृत उपयोग किया जाता है। ये सभी घटनाएं धार्मिक भावनाओं को आहत करनेवाली हैं। इससे गणेशोत्सव और भगवान श्रीगणेश का घोर अपमान हो रहा है, जिसे रोककर पवित्रता की रक्षा हेतु शासन को कदम उठाने चाहिए, ऐसी मांग हिन्दू जनजागृति समिति ने निवेदन देकर की है।
निवेदन नागपूर के उपजिलाधिकारी  अनुप खांडे जी के माध्यम से नागपूर के  जिलाधिकारी को दिया। तथा महापालिका आयुक्त इन्हें दिया। इस अवसर पर अधिवक्ता अभिषेक तिवारी, अधिवक्ता गणेश बिस्सा, चित्पावन ब्राह्मण संघाचे जिल्हा सचिव  उमाकांत रानडे, हनुमान मंदिर चे अध्यक्ष डॉ. राजेश कुऱ्हाडे, हिंदुत्वनिष्ठ  हरिश येंडे, महाराष्ट्र मंदिर महासंघाचे  आशिष नागपूरकर, हिंदू जनजागृती समितीचे  अतुल अर्वेनला, अभिजीत पोलके, धर्मप्रेमी अतुल भालेराव तथा अन्य धर्मप्रेमी उपस्थित थे।
निवेदन में कहा गया है कि, कुछ मंडल और कंपनियां गुटखा, तंबाकू, शराब, ऑनलाइन जुआ आदि के विज्ञापनों के लिए भी गणेश का उपयोग करती हैं। यह चौंकानेवाला है तथा उत्सव के मूल उद्देश्य को विकृत करनेवाला है। अधिक गंभीर विषय यह है कि विसर्जन प्रक्रिया में भी मूर्तियों का अपमान हो रहा है तथा महानगरपालिका और स्थानीय संस्थाएं मूर्तियों को कचरा गाड़ियों से ले जाकर निर्जन स्थलों या खाड़ियों में फेंक देती हैं। पुणे, मुंबई, नाशिक सहित अनेक स्थानों पर इस विषय में समाचारपत्रों में छायाचित्रों सहित प्रकाशित किया गया है। तथाकथित पर्यावरणपूरक कृत्रिम हौद में विसर्जन के बाद मूर्तियों के अवशेष मजदूरों के पैरों तले रौंदे जाते हैं, यह गंभीर अपमान है। शासन अथवा स्वयंसेवी संस्थाएं मूर्तियों का ‘दान’ मांगती हैं; किन्तु धर्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य देवता का दान नहीं दे सकता। भक्त ने स्वयं को देवता के चरणों में अर्पण करना होता है। अनेक स्थानों पर मूर्तियों का पुनः उपयोग या पुनर्विक्रय किया जाता है, जो धर्मशास्त्रविरोधी और अनुचित है। इन कार्यों से सामाजिक असंतोष निर्माण होने का खतरा है। साथ ही कानूनन यह अपराध होने से समिति की मांग है कि गणेशजी का विज्ञापनों अथवा विडंबनात्मक रूप में उपयोग तत्काल बंद करने हेतु अधिसूचना निकाली जाए। उसकी प्रसिद्धि की जाए। विसर्जन के लिए कचरा गाड़ियां अथवा कृत्रिम हौद का उपयोग रोककर बहते जल की स्वच्छ व्यवस्था की जाए। मूर्तिदान मांगने की प्रथा स्थायी रूप से बंद की जाए। साथ ही “भगवान श्रीगणेश का सम्मान बनाए रखें” इस आशय का जनजागृति अभियान राज्यभर चलाया जाए।