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यातायात पुलिस को रिश्वत न देने पर किया झूठा मामला दर्ज

– हाईकोर्ट ने पुलिस को पाया दोषी, अधिकार का दुरूपयोग न करने की सलाह

नागपुर :- बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक युवक को अवैध रूप से हिरासत में लेने और यातायात उल्लंघन के नाम पर उसके खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने के गंभीर मामले का खुलासा किया है. पुलिस द्वारा कानून का उल्लंघन करने का हवाला देते हुए, न्या. उर्मिला जोशी-फालके और नंदेश देशपांडे की बेंच ने संबंधित युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया. हालांकि, मोटर वाहन अधिनियम के सीमित उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई की गई है.

पारशिवनी निवासी तुषार केशव कोसरकर के वाहन को 27 मई, 2०23 को यातायात पुलिस ने रोका था. पुलिस ने वाहन पर काली फिल्म होने और क्षमता से अधिक यात्रियों को ले जाने के आरोप में उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी. हालांकि, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पुलिस ने उससे रिश्वत की मांग की, इनकार करने पर उसकी पिटाई की, उसे अवैध रूप से हिरासत में लिया और खुद को बचाने के लिए उसके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए.

इस मामले में पुलिस ने शाम 5.18 बजे मामला दर्ज किया, जबकि वाहन को वास्तव में दोपहर 12 बजे रोका गया था. याचिकाकर्ता को सीसीटीवी रहित कमरे में रखा गया था, गिरफ्तारी के समय को लेकर थाने की डायरी में विसंगतियां पाई गईं और जांच रिपोर्ट से पता चला कि गिरफ्तारी संबंधी सर्वो’च न्यायालय के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया था.

खंडपीठ ने गौर किया कि सरकारी कर्मचारी पर हमले (धारा 332), सरकारी कामकाज में बाधा डालने (धारा 353), अभद्र भाषा का प्रयोग और धमकी देने के संबंध में कोई ठोस सबूत नहीं है. यात्रियों के बयानों से केवल यह पता चलता है कि बहस हुई थी, शारीरिक बल का वास्तविक प्रयोग सिद्ध नहीं हुआ है. इसलिए, कानून की दृष्टि से इन धाराओं को लागू करना अनुचित है. महत्वपूर्ण बात यह है कि आंतरिक जांच रिपोर्ट में ही कहा गया है कि संबंधित पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया, अपने वरिष्ठों को गुमराह किया और याचिकाकर्ता को अवैध रूप से हिरासत में लिया. यदि कानून लागू करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी ही कानून का उल्लंघन कर रहे हैं, तो न्यायपालिका पर जनता का विश्वास डगमगा जाता है, न्यायालय ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की. हालांकि, याचिकाकर्ता ने यह स्वीकार किया कि वाहन में उसकी क्षमता से अधिक यात्री सवार थे, इसलिए मोटर वाहन अधिनियम की धारा 66(1) और 177 के तहत कार्रवाई जारी रहेगी.

याचिकाकर्ता ने की थी मुआवजे की मांग

याचिकाकर्ता ने मुआवजे की मांग भी की थी, लेकिन उसके व्यवहार और वाहन अधिनियम के उल्लंघन को देखते हुए न्यायालय ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया. इस बीच, नागपुर ग्रामीण पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया गया है कि वे इस फैसले की एक प्रति संबंधित पुलिस अधिकारियों की गोपनीय रिपोर्ट में रखें. न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि महाराष्ट्र पुलिस बल के आदर्श वाक्य, ‘सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय’ को लागू करना आवश्यक है.

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