मुंबई :- राष्ट्रसंत श्री समर्थ रामदास स्वामी महाराज द्वारा रचित पवित्र धार्मिक ग्रंथ ‘मनाचे श्लोक’ के नाम का उपयोग करके उसी शीर्षक से मराठी फिल्म का निर्माण करना, हिंदुओं की आस्था का बाजारीकरण करने जैसा है। यह समर्थ रामदास स्वामी का सीधा अपमान है। उच्चतम नैतिक मूल्य सिखाने वाले ग्रंथ के नाम का उपयोग केवल मनोरंजन, व्यावसायिक लाभ और सस्ती लोकप्रियता के लिए करना, करोड़ों श्रीरामभक्तों और समर्थभक्तों की धार्मिक भावनाओं को कुचलने जैसा है। संत परंपरा का यह अपमान हिंदू समाज कभी सहन नहीं करेगा। यदि इस फिल्म का नाम तत्काल नहीं बदला गया, तो हिंदू समाज सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेगा और फिल्म को प्रदर्शित नहीं होने देगा। सरकार और सेंसर बोर्ड इस पर तत्काल ध्यान दें और “मनाचे श्लोक” जैसे नाम को फिल्म के शीर्षक से हटाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करें, यह मांग हिंदू जनजागृति समिति के महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ राज्य संगठक, सुनील घनवट ने की है।
सुनील घनवट ने आगे कहा, “इस संदर्भ में समिति की ओर से सरकार और सेंसर बोर्ड को एक ज्ञापन दिया है और संबंधित पक्षों को कानूनी नोटिस भी भेजा जाएगा। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई कुरान या बाइबिल जैसे पवित्र ग्रंथों के नामों का उपयोग करके फिल्म बनाने का साहस करेगा? और यदि कोई करता भी है, तो क्या सेंसर बोर्ड उसे अनुमति देगा? फिर केवल हिंदुओं की ही धार्मिक भावनाओं को बार-बार क्यों ठेस पहुँचाई जाती है? पूर्व में, ‘द डा विंची कोड’ और ‘विश्वरूपम’ जैसी फिल्मों द्वारा क्रमशः ईसाई और मुस्लिम समुदायों की भावनाओं को आहत करने के कारण कई राज्यों में उनके प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यदि इस फिल्म के मामले में भी कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होती है, तो इसके लिए पूरी तरह से फिल्म के निर्माता, निर्देशक और सेंसर बोर्ड जिम्मेदार होंगे।”
घनवट ने आगे कहा, “सर्वोच्च न्यायालय ने लाल बाबू प्रियदर्शी बनाम अमृतपाल सिंह [(2015) 16 SCC 795] के मामले में स्पष्ट किया है कि ‘रामायण’ जैसे पवित्र ग्रंथों के नामों का व्यावसायिक लाभ के लिए एकाधिकार के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। इस सिद्धांत के अनुसार, ‘मनाचे श्लोक’ जैसे धर्मग्रंथ का नाम फिल्म के लिए उपयोग करना कानून और नैतिकता के विरुद्ध है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 के अनुसार, जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना एक गंभीर, संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है; साथ ही, सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 की धारा 5-B के अनुसार, सामाजिक सद्भाव और नैतिकता को खतरे में डालने वाली किसी भी फिल्म को प्रमाणित न करने की जिम्मेदारी सेंसर बोर्ड की है।”
अंत में, घनवट ने कहा कि ‘मनाचे श्लोक’ शीर्षक को फिल्म से तुरंत और बिना शर्त वापस लिया जाना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को भविष्य में धार्मिक प्रतीकों के ऐसे दुरुपयोग को रोकने के लिए एक कठोर कानून बनाना चाहिए।




