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चंद्रपुर जिला बना ‘गैस चेंबर’: अप्रैल में 26 दिन ‘जहर’ उगलती रही हवा, प्रशासन की बेशर्मी जारी!

– प्रशासन की ‘खामोशी’ और धूल के ‘बवंडर’ ने किया जीना मुहाल; अप्रैल की गर्मी में भी हवा हुई ‘जहरीली’

चंद्रपुर :- विदर्भ का ‘ब्लैक गोल्ड’ कहे जाने वाले चंद्रपुर जिले में अब सांस लेना किसी खतरे से खाली नहीं रह गया है। जहां एक ओर सूरज की तपिश लोगों को झुलसा रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण का स्तर सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है। ताज़ा आंकड़ों ने जिले की डरावनी तस्वीर पेश की है—अप्रैल महीने के 30 दिनों में से पूरे 26 दिन यहां की हवा ‘प्रदूषित’ श्रेणी में रही। मतलब साफ है, महीने के 85% समय चंद्रपुर वासी ऑक्सीजन नहीं, बल्कि ‘धीमा जहर’ फांक रहे थे।

अच्छे दिन’ गायब, सिर्फ ‘धूल’ का राज

हैरानी की बात तो यह है कि अप्रैल के पूरे महीने में एक भी दिन ऐसा नहीं रहा, जब वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 0 से 50 (अच्छी श्रेणी) के बीच दर्ज किया गया हो।

PM10 का तांडव: 26 दिनों तक PM10 (धूल के कण) का स्तर खतरे के निशान के ऊपर रहा।

PM2.5 और ओजोन: इन घातक तत्वों ने भी बाकी बचे दिनों में कसर पूरी कर दी।

प्रदूषण के ‘विलेन’ कौन?

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित बर्बादी है। प्रदूषण की इस आग में घी डालने का काम ये कारक कर रहे हैं

थर्मल पावर प्लांट: बेतहाशा उत्सर्जन।

भारी यातायात: सड़कों पर उड़ती कोयले की धूल और वाहनों का धुआं।

कचरा दहन: खुले में कचरा जलाना और बायोमास बर्निंग।

स्थानीय उद्योग: नियमों को ताक पर रखकर चलता औद्योगिक खेल।

“अप्रैल की गर्मी में प्रदूषण का यह स्तर चिंताजनक है। धूल के कणों में यह वृद्धि कचरा जलाने और बेकाबू यातायात की वजह से हुई है। प्रशासन को अब ठोस कदम उठाने ही होंगे।”

— सुरेश चोपणे, पर्यावरण एवं मौसम विशेषज्ञ

बीमार हो रहा है बचपन और बुढ़ापा

प्रदूषण की इस मार से अस्पताल मरीजों से पटने लगे हैं। विशेषकर जिन्हें सांस की बीमारी है, उनके लिए चंद्रपुर की हवा ‘डेथ वारंट’ बनती जा रही है। अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले के लोगों को पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर घूमना पड़ेगा।

क्या सो रहा है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB)?

अखबार सवाल उठाता है कि आखिर महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन किस बात का इंतजार कर रहे हैं? पिछले महीने पर्यावरण मंत्री के दौरे और उनकी ‘चिंता’ के बावजूद जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला। क्या प्रशासन सिर्फ फाइलों में ‘वृक्षारोपण’ और ‘साइकिल चलाओ’ के नारे लगाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगा?

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