प. पु. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत
विश्व को दिशा दिखाने वाला आदर्श स्थापित करना यह भारत का दायित्व ।
धर्मजागरण न्यास के नवनिर्मित कार्यालय का लोकार्पण
नागपुर, ७ : दुनिया के लोग कहते हैं कि हम अलग हैं, इसलिए हमें एक होना होगा। हालाँकि, हमारा धर्म हमें विविधता को स्वीकार करना सिखाता है। हिन्दू धर्म हमें मानव धर्म का पालन करना सिखाता है। यद्यपि सभी का मार्ग अलग है, लेकिन गंतव्य एक ही है। इसलिए हमें दूसरों का मार्ग बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आपका मार्ग कौन सा है, इस बात पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। धर्मजागरण होने पर ही हिन्दू धर्म का आचरण करने वाला समूह अस्तित्व में रहेगा। यह केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रहेगा । विश्व को दिशा दिखाए ऐसा आदर्श स्थापित करना, यह भारत की जिम्मेदारी है, ऐसा प्रतिपादन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प. पु. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने किया । बुधवार को नागपुर के भगवान नगर स्थित धर्मजागरण न्यास के नवनिर्मित कार्यालय के लोकार्पण समारंभ में वे बोल रहे थे।
धनश्री सभागार में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य भैय्याजी जोशी, मा. प्रांत संघचालक दीपकजी तामशेट्टीवार, प्रांत सहसंघचालक श्रीधर जी गाडगे, मा. नागपुर महानगर संघचालक राजेशजी लोया, धर्मजागरण गतिविधि के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य शरदजी ढोले और धर्मजागरण न्यास के अध्यक्ष विजयजी कैथे उपस्थित थे।
प. पु. सरसंघचालक जी ने आगे कहा, सनातन धर्म आत्मीयता और विविधता को पूर्ण रूप से स्वीकार करना सिखाता है। भारत में विविधता होते हुए भी अंततः सभी लोग एक ही हैं। सभी विविधताओं को स्वीकार करना यही सच्चा धर्म है। धर्म का कार्य केवल ईश्वर के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी है। इसलिए यदि धर्म सही है, तो समाज में संतुलन और शांति संभव है। धर्म का कोई भी कार्य पवित्र होता है। जिसे हम धर्म कहते हैं, वह सत्य है। हमारे देश में विविधता दिखाई देती है, लेकिन यह एकता का आविष्कार है। धर्मजागरण के माध्यम से पवित्रता, सत्य, तप और करुणा जागृत होती है। अतः इसके लिए प्रयास करने होंगे। सुनीलजी भुलगांवकर ने सूत्रसंचालन किया। इस अवसर पर प. पु. सरसंघचालक जी ने धीरज महाकालकर, विवेक देशकर और चंदन सिंह का सम्मान किया।
धर्मरक्षा के लिए बलिदान देने वाले आदर्श
धर्म याने कर्तव्य यह अपना विचार है। इसी से राजधर्म, प्रजाधर्म, पितृधर्म जैसी बातें सामने आईं। कई लोगों के जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आती हैं और उनका साहस टूट जाता है। इस कारण वे सही मार्ग छोड़ देते हैं। लेकिन पुरुषार्थी लोग बिना थके या रुके अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपने धर्म के प्रति अडिग रहते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन में संकट आए, लेकिन उन्होंने बल और बुद्धि से रास्ता निकाला। व्यक्ति के मन में धर्म के प्रति निष्ठा दृढ़ होनी चाहिए। धर्म के लिए कई लोगों ने बलिदान दिया है। उन्हें यातनाएँ दी गईं, लेकिन उन्होंने धर्म का त्याग नहीं किया। ऐसे लोग हमारे सामने आदर्श हैं, ऐसा प. पु. सरसंघचालक जी ने कहा।




