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स्कूलों में लड़कियों को फ्री सैनेटरी पैड मिले : सुप्रीम कोर्ट

– लड़के-लड़कियों के अलग टॉयलेट हों

– आदेश न मानने पर स्कूल की मान्यता रद्द होगी

नई दिल्ली :- सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश के सभी प्राइवेट और सरकारी स्कूलों को निर्देश दिया कि हर स्कूल में लड़कियों को फ्री में सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य होगा। लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम बनाने होंगे। जो स्कूल ऐसा नहीं कर पाएंगे, उनकी मान्यता रद्द की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में दिव्यांगों के अनुकूल (डिसेबल फ्रेंडली) टॉयलेट बनाए जाएं। केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में पिछले 4 सालों से सुनवाई चल रही थी। कोर्ट ने आज सिर्फ फैसला सुनाया है। सोशल वर्कर जया ठाकुर ने 2022 में एक जनहित याचिका लगाई थी। उनकी मांग थी कि मेन्स्ट्रुयल हाइजीन पॉलिसी को पूरे देश में लागू किया जाए।

कोर्ट के 2 सवाल…

– अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) का उल्लंघन है। अगर लड़कियों को सैनिटरी पैड नहीं मिलते तो वे लड़कों की तरह बराबरी से पढ़ाई और गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पातीं।

– मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधा मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का हिस्सा है। अगर लड़कियों को उचित सुविधा नहीं मिलती तो उनकी गरिमा और निजता प्रभावित होती है।

कोर्ट ने कहा- लड़कियों के शरीर को बोझ के रूप में देखा जाता है

कोर्ट ने कहा कि यह आदेश सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं है। यह उन क्लासरूम के लिए भी है, जहां लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं। यह उन टीचर्स के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण बंधे हुए हैं। यह उन माता-पिता के लिए भी है, जो शायद यह नहीं समझ पाते कि उनकी चुप्पी का क्या असर पड़ता है। यह समाज के लिए भी है, ताकि प्रगति का पैमाना इस बात से तय हो कि हम अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा करते हैं। हम हर उस बच्ची तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं, जो स्कूल में अनुपस्थिति की शिकार बनी, क्योंकि उसके शरीर को बोझ की तरह देखा गया, जबकि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है।

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