– जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल
– सीमेंट सड़कों के नाम पर हरियाली पर हमला
नागपुर :- सीमेंट रोड के निर्माण और चौड़ाईकरण के चलते किनारों के पेड़ों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने का हवाला देते हुए शरद पाटिल की ओर से हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई. गुरुवार को सुनवाई के दौरान शहर में चल रहे विकास और पुनर्निर्माण कार्यों के दौरान पर्यावरण और पेड़ों की अनदेखी का फिर से मामला उजागर हुआ. मनपा को पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट बिछाकर उनका दम घोंटने और सार्वजनिक धन की बर्बादी करने के लिए हाई कोर्ट द्वारा कड़ी फटकार लगाई गई.
अधिकारियों की लापरवाही और अदालत की नाराजगी : अदालत ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि पुनर्निर्माण कार्यों के दौरान महानगर पालिका बार-बार वही पुरानी गलतियां दोहरा रही है. जब निर्माण कार्य मनपा द्वारा किया जा रहा है, तो मौके पर मौजूद इंजीनियर और अधिकारी इसे क्यों नहीं देखते और क्यों नहीं रोकते. कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मनपा के अधिकारी अदालत के आदेशों और पेड़ों के अस्तित्व को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं. हालात यह है कि जब तक कोई नागरिक तस्वीरें नहीं भेजता या पेड़ों को बचाने के लिए बार-बार याचिका दायर नहीं करता, तब तक अधिकारी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाते है.
जनता के पैसे की दोहरी बर्बादी और जांच के संकेत : कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू जनता के पैसों की बर्बादी है. सुनवाई में यह बात सामने आई कि मनपा पहले तो पेड़ों के चारों ओर अनावश्यक कंक्रीट बिछाने के लिए पैसे का भुगतान करती है और फिर उसी कंक्रीट को हटाने के लिए दोबारा पैसे देती है. इसे जनता के पैसों की घोर बर्बादी बताते हुए अदालत ने कहा कि अधिकारी न तो पेड़ों के प्रति गंभीर हैं और न ही जनता के पैसे के लिए. अदालत ने इस कार्यप्रणाली के पीछे किसी ‘निजी स्वार्थ’ की संभावना जताते हुए जांच के स्पष्ट संकेत दिए. यह भी पूछा गया कि क्या मनपा पेड़ों के आसपास किए गए उस अनावश्यक कंक्रीट के काम का बिल पास कर रही है.
यह सुनवाई के दौरान अदालत मित्र द्वारा सुझाव दिया गया कि मौजूदा और भविष्य के सभी ठेकों में यह अनिवार्य शर्त जोड़ी जानी चाहिए कि विकास कार्यों के दौरान सड़क पर मौजूद पेड़ों को कंक्रीट से मुक्त रखा जाएगा. अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि कई आदेशों के बावजूद मनपा ने अभी तक यह शर्त अपने ठेकों में क्यों नहीं शामिल की.
सुनवाई के दौरान पेड़ों की गिनती में हो रही देरी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा. कोर्ट का मानना था जो काम 2022 तक पूरा हो जाना चाहिए था, वह अभी भी लंबित है. हालांकि यह बताया गया कि एक एजेंसी नियुक्त की गई है जो विशेष उपकरणों और मशीनों से लैस वाहनों के जरिए पेड़ों की स्वचालित गिनती कर रही है और उनकी तस्वीरें व विवरण दर्ज कर रही है. इसके बावजूद इसकी अंतिम रिपोर्ट और प्रमाण अभी तक जमा नहीं किए गए हैं.
पेड़ों को बचाने के लिए फिर हाई कोर्ट को करना पड़ा हस्तक्षेप
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने मनपा को निर्देश दिया कि वह ठेकों में वृक्ष संरक्षण की शर्तें शामिल करने पर अपना जवाब दाखिल करे. इसके अलावा, जिन जगहों पर पेड़ों का दम घोटा गया था वहां के जिम्मेदार अधिकारी की पहचान करने और यह बताने का भी निर्देश दिया गया कि उस अधिकारी ने अपना काम ठीक से क्यों नहीं किया.







