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नीट पेपर लीक के बाद कोचिंग माफिया पर शिकंजा कब?

– इंटीग्रेटेड मॉडल के नाम पर शिक्षा नियमों की उड़ रही धज्जियां

– पेपर लीक से कोचिंग कनेक्शन तक: शिक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल

नागपुर :- देशभर में चर्चित हुए नीट पेपर लीक प्रकरण के बाद अब निजी कोचिंग संस्थानों की भूमिका और उन पर नियंत्रण को लेकर बहस तेज हो गई है. मामले में बड़े कोचिंग नेटवर्क के नाम सामने आने के बाद यह सवाल फिर उठने लगा है कि आखिर निजी कोचिंग क्लासेस को नियंत्रित करने वाला कानून कब लागू होगा. लातूर के आरसीसी कोचिंग संस्था के संचालक शिवराज मोटेगांवकर की गिरफ्तारी से शहर के कोचिंग क्षेत्र में भी हड़कंप मच गया. इस बीच मंगलवार को सीबीआई की टीम ने नागपुर में सेंट्रल ऐवन्यू और इतवारी में रहने वाले दो छात्रों के घरों में छापेमारी की. वहीं चंद्रपुर में भी एक जगह कार्रवाई की गई. कोचिंग संस्थाओं की परीक्षाओं में दखलंदाजी कोई नई बात नहीं है. पिछले दिनों 12वीं स्टेट बोर्ड के 3 विषयों के पेपर लीक हुए थे. इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई. जांच में कोचिंग क्लास से ही पेपर लीक होने का खुलासा हुआ था. इस मामले के भी सभी आरोपी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके. अभी कुछ पेपर लीक करने वाले बाहर घूम रहे हैं. पूर्व शिक्षा मंत्री विनोद तावडे के कार्यकाल में निजी कोचिंग संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. उस समय एक प्रारूप भी तैयार किया गया था लेकिन वह कानून अमल में नहीं आ सका. इसके बाद भी राज्य शिक्षा विभाग ने कोचिंग क्लासेस पर नियंत्रण के लिए मसौदा तैयार किया, मगर उसे आज तक मंजूरी नहीं मिल सकी है.

केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष निजी कोचिंग संस्थानों के संचालन को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे. इनमें विद्यार्थियों पर अत्यधिक दबाव, भ्रामक विज्ञापन, अत्यधिक फीस और अनियमित शैक्षणिक व्यवस्थाओं को नियंत्रित करने की बात कही गई थी. हालांकि जमीनी स्तर पर इन नियमों का प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है.

यदि राज्य बोर्ड के नियमों के अनुसार 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के लिए स्कूल या कॉलेज में कम से कम 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है. इतनी उपस्थिति होने पर परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलती है. कोई छात्र बीमार है या अन्य किसी कारण से 75 फीसदी उपस्थिति पूरी नहीं कर पाता तो उसे कारण देना अनिवार्य होता है. लेकिन ‘इंटीग्रेटेड’ और ‘टाइअप’ मॉडल के जरिए कई विद्यार्थी वास्तविक रूप से कॉलेज में उपस्थित हुए बिना काल ठोस कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं. इस व्यवस्था में कुछ कोचिंग संस्थान कनिष्ठ महाविद्यालयों (जूनियर कॉलेज) के साथ समझौता कर विद्यार्थियों का प्रवेश वहां दिखाते हैं, जबकि पढ़ाई पूरी तरह कोचिंग सेंटर में कराई जाती है. कॉलेजों में केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराई जाती है.

सरकार ने स्कूलों जूनियर कॉलेजों में छात्रों की उपस्थिति के लिए बायोमेट्रिक उपस्थित को अनिवार्य किया है.

बायोमेट्रिक हाजिरी के बावजूद कॉलेजों से गायब छात्र

हालांकि कुछ अनुदानित महाविद्यालयों में उपस्थिति की सख्ती की जाती है लेकिन अधिकांश जगह नहीं होती. जब छात्र जूनियर कॉलेज की बजाय कोचिंग में जाएंगे तब उपस्थिति कैसे दर्ज होगी. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में भी कोचिंग संस्कृति को माध्यमिक शिक्षा के लिए नुकसानदायक बताया गया है. नीति में कहा गया है कि बोर्ड परीक्षाएं जारी रहेंगी लेकिन ऐसी सुधारात्मक व्यवस्था विकसित की जाएगी जिससे विद्यार्थियों को निजी कोचिंग पर निर्भर न रहना पड़े.


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