spot_imgspot_img

Latest News

spot_img

Related Posts

300 वर्ष पुराना भोसलेकालीन कुआं खो रहा अपना ऐतिहासिक वैभव

– एक समय एयरपोर्ट क्षेत्र की जीवनरेखा था

– जिलाधिकारी, विधायक और जनप्रतिनिधियों से तत्काल पुनर्जीवन व संरक्षण की मांग

नागपुर :- डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय विमानतल परिसर के समीप सोनेगांव–अमराईपारा मार्ग के पास स्थित भोसलेकालीन ऐतिहासिक कुआं वर्तमान में उपेक्षा के कारण जर्जर अवस्था में पहुंच गया है। लगभग 300 वर्ष पुराना यह कुआं भोसले शासनकाल में निर्मित माना जाता है और एक समय सुव्यवस्थित पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा था। आज यह कुआं कचरा, प्लास्टिक और काई से भर गया है और धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है।

इस कुएं के आसपास एक प्राचीन मंदिर, हरियाली से घिरा क्षेत्र और वन क्षेत्र मौजूद है, जिससे इसका ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्व और बढ़ जाता है। आबादी से कुछ दूरी पर होने के बावजूद यहां प्रतिदिन कई लोग आते हैं। विशेष रूप से युवा यहां पिकनिक मनाने, जन्मदिन मनाने और छोटे कार्यक्रम आयोजित करने पहुंचते हैं। लेकिन इन गतिविधियों के बाद कचरा और प्लास्टिक कुएं व आसपास फेंक दिए जाने से इसकी स्थिति और खराब हो रही है।

कुएं की संरचना भी अब खतरनाक होती जा रही है। इसकी दीवारों के कई हिस्से टूट चुके हैं और किसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। कुएं में नीचे उतरने के लिए पत्थर की सीढ़ियां बनी हुई हैं, जो पारंपरिक वास्तुकला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसका पत्थर का निर्माण और संरचना इसकी प्राचीनता और भोसलेकालीन शैली को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। प्रतिदिन मॉर्निंग वॉक करने वाले नागरिक इसकी खराब स्थिति देखकर चिंतित हैं और उन्होंने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है।

इस संदर्भ में जल अभ्यासक, जल योद्धा पुरस्कार प्राप्त तथा नर्व स्टिमुलेशन थेरेपिस्ट डॉ. प्रवीण डबली ने जिलाधिकारी, स्थानीय विधायक, नगरसेवकों और संबंधित विभागों से कुएं के पुनर्जीवन और संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि इस कुएं का पुनर्जीवन किया जाए तो इसका पानी आसपास की हरियाली, वन संरक्षण और एयरपोर्ट क्षेत्र की बागवानी के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। आपातकालीन स्थिति में यह एक वैकल्पिक जल स्रोत के रूप में भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

डॉ. डबली ने नागपुर जिले की सभी ऐतिहासिक कुओं का वैज्ञानिक मैपिंग और सर्वेक्षण किए जाने की आवश्यकता भी बताई। उनके अनुसार कई प्राचीन कुएं अभी तक आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की सूची में शामिल नहीं हैं, जिसके कारण उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसे ऐतिहासिक जल स्रोतों का समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली समाप्त हो जाएगी और हमारी समृद्ध विरासत धीरे-धीरे लुप्त हो जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कुओं का पुनर्जीवन भूजल स्तर बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण और धरोहर बचाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

– डॉ. प्रवीण डबली

स्वतंत्र वरिष्ठ पत्रकार | जल कार्यकर्ता | जल योद्धा पुरस्कार प्राप्त,पोश्चर करेक्शन प्रशिक्षक | योग थेरेपिस्ट | हेल्थ मोटिवेशनल स्पीकर | नर्व स्टिमुलेशन थेरेपिस्ट मोबाइल: 9422125656 / 7020343428

Popular Articles