– शालार्थ आईडी प्रकरण में वेतन रोके जाने से आंदोलन उग्र
नागपुर :- अफसरों के घोटालों की कीमत निर्दोष शिक्षक क्यों चुकाएँ? शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है, यदि वही अधिकारी अनियमितताओं और घोटालों में लिप्त पाए जाते हैं, तो उसका दंड निर्दोष शिक्षकों को देना न केवल घोर अन्याय है, बल्कि कानून और संविधान दोनों का खुला अपमान है। शालार्थ आईडी प्रकरण इसका ज्वलंत उदाहरण बन चुका है।
वेतन वंचितता के विरोध में शिक्षकों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। प्राप्त जानकारी के अनुसार न्यायालय ने स्पष्ट और दो-टूक शब्दों में वेतन भुगतान के आदेश दिए थे। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा इन आदेशों की खुलेआम अनदेखी की गई। यह स्थिति मात्र प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि न्यायिक अवमानना की श्रेणी में आती है, जो न केवल कानून के शासन पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत देती है। इससे शिक्षकों में भारी रोष व्याप्त है। न्यायालय के आदेशों का पालन करना प्रशासन की विवशता नहीं, बल्कि उसका संवैधानिक कर्तव्य है। समय रहते यदि जिम्मेदार अफसरों पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो इसका खामियाजा केवल शिक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र और जनविश्वास को भी भुगतना पड़ेगा।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन अधिकारियों की गलत नीतियों, फर्जी प्रस्तावों और भ्रष्ट निर्णयों के कारण यह संकट उत्पन्न हुआ, उन पर ठोस और निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इसके विपरीत, वर्षों से ईमानदारी से सेवा दे रहे शिक्षक आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव और सामाजिक अपमान झेलने को विवश हैं।
शिक्षक संगठनों की यह मांग पूरी तरह न्यायसंगत है कि दोषियों को सख्त सजा मिले और निर्दोष शिक्षकों को तत्काल न्याय दिया जाए। यदि प्रशासन अब भी आंखें मूंदे रहा, तो यह आंदोलन केवल वेतन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर सीधा और निर्णायक सवाल बनकर उभरेगा?
उधर, शालार्थ आईडी प्रकरण के नाम पर पिछले 10 महीनों से 632 शिक्षकों का वेतन रोके जाने से शिक्षा जगत में रोष लगातार बढ़ता जा रहा है। नागपुर के यशवंत स्टेडियम में जारी बेमुदत धरना अब मानवीय संकट में तब्दील हो चुका है। कड़ाके की ठंड, मूलभूत सुविधाओं का अभाव और प्रशासन की संवेदनहीनता ने हालात को और गंभीर बना दिया है विशेषकर तब, जब आंदोलन में बड़ी संख्या में महिला शिक्षिकाएं, जिनमें दो गर्भवती भी शामिल हैं, भाग ले रही हैं।
स्वास्थ्य पर सीधा असर, ICU तक पहुंची शिक्षिका
शुक्रवार सुबह 6 माह की गर्भवती एक शिक्षिका की तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। 5 माह की दूसरी गर्भवती शिक्षिका का मौके पर मौजूद एम्बुलेंस डॉक्टर ने परीक्षण तो किया, लेकिन स्थायी उपचार नहीं मिल सका। इसके अलावा एक शिक्षिका का बीपी खतरनाक रूप से गिरने पर उन्हें ICU में भर्ती कराना पड़ा। यह स्थिति प्रशासन की संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अधिकारियों का घोटाला, सज़ा शिक्षकों को?
जांच में तीन उपसंचालक, शिक्षा अधिकारी सहित 20 से अधिक अधिकारी-कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इसके बावजूद, जिन शिक्षकों की नियुक्ति नियमों के अनुसार हुई और जिनका शालार्थ आईडी स्वयं विभाग ने जारी किया, उन्हीं का वेतन रोका गया। आंदोलनरत शिक्षकों का सवाल सीधा है—जब आईडी विभाग ने दी, ड्रॉप भी विभाग से मिला, तो संदेह शिक्षकों पर क्यों?
हज़ारों परिवार तबाही की कगार पर
वेतन रुकने से हज़ारों परिवारों की आजीविका ठप हो गई है। बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया, इलाज—सब प्रभावित हैं। कई घरों में तीन समय का भोजन और जरूरी दवाएं तक बंद हो चुकी हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय है।
आंदोलनरत शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि तुरंत वेतन जारी नहीं किया गया और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन और तेज होगा। शिक्षकों ने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से तत्काल संज्ञान लेकर समाधान निकालने की अपील की है।
शिक्षकों का सरकार से सवाल
निर्दोष शिक्षकों का वेतन रोककर किसे बचाया जा रहा है?
न्यायालय के आदेशों की अवहेलना क्यों?
गर्भवती शिक्षिकाओं की सेहत और गरिमा की जिम्मेदारी कौन लेगा?




