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 ‘कड़वा बोलो’ : कांग्रेस के आत्ममंथन का वक्त, सच से भागना समाधान नहीं

– लगातार हार के बीच उम्मीद की किरण — हर्षवर्धन सपकाल से नई दिशा की उम्मीद

नागपुर :- राजनीति में सफलता और असफलता का सिलसिला चलता रहता है। लेकिन जब किसी संगठन या पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ता है, तब आत्ममंथन और सच्चाई को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है। यही वह समय होता है जब ‘कड़वा’ सच बोलने की हिम्मत दिखानी पड़ती है — चाहे वह नेता हो, संगठन हो या पूरा राजनीतिक दल। कांग्रेस पार्टी इन दिनों कुछ इसी दौर से गुजर रही है। लगातार पराजय और संगठनात्मक कमज़ोरियों के कारण पार्टी का आत्मविश्वास डगमगा गया है। जनता के बीच वह पुराना विश्वास फिर से हासिल करना पार्टी के लिए एक चुनौती बन गया है।

फिर भी, उम्मीद की किरणें बाकी हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बंटी उर्फ़ हर्षवर्धन सपकाल को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जा रहा है जो ईमानदारी से आत्मचिंतन करने और संगठन को नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं। वे पुराने ढर्रे से हटकर युवाओं को आगे लाने स्तर पर संवाद बढ़ाने और जनता के मुद्दों को केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं।

कांग्रेस के लिए अब यह समय सिर्फ़ हार के कारणों पर बहस करने का नहीं, बल्कि संगठन को पुनर्जीवित करने का है। इसके लिए आवश्यक है कि पार्टी अपने भीतर के ‘कड़वे’ सच को स्वीकार करे चाहे वह नेतृत्व के फैसलों की गलतियाँ हों, कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता हो या जनता से दूर होती छवि। जो पार्टी अपने भीतर की गलतियों को पहचानकर सुधार की दिशा में कदम उठाती है, वही कठिनाइयों के दौर से निकलकर सफलता की राह पर लौट सकती है। इसलिए, अब कांग्रेस को ‘कड़वा बोलने’ का साहस दिखाना ही होगा।


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