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चंद्रपुर जिले में खिला ‘हाथ’, भाजपा का हुआ ‘सुफड़ा साफ’: कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत से विदर्भ की राजनीति में भूचाल

– कमल मुरझा गया….

चंद्रपुर :- विदर्भ की राजनीति का ‘पावर सेंटर’ कहे जाने वाले चंद्रपुर जिले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अब तक के सबसे बड़े सियासी झटकों में से एक का सामना करना पड़ा है। हाल ही में संपन्न हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के नतीजों ने जिले की राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जिले में भाजपा का पूरी तरह से ‘सुफड़ा साफ’ हो गया है, जबकि कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी करते हुए अपना परचम लहराया है।

इन नतीजों ने न केवल स्थानीय नेतृत्व की नींद उड़ा दी है, बल्कि राज्य स्तर पर भाजपा के रणनीतिकारों के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है। सबसे चौंकाने वाला पहलू भाजपा के वरिष्ठ नेता और कद्दावर मंत्री सुधीर मुनगंटीवार की प्रतिक्रिया है, जिसमें उन्होंने न केवल अपनी ही पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि अपने घटते कद और पार्टी के ‘शनिशिंगणापुर’ बन जाने जैसे तीखे बयान देकर राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

चुनावी नतीजे: आंकड़ों में भाजपा की करारी शिकस्त

चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति भाजपा के लिए बेहद शर्मनाक दिखाई देती है। चंद्रपुर जिले की स्थानीय स्वराज संस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत करने का दावा करने वाली भाजपा औंधे मुंह गिरी है।

कांग्रेस (Congress): 8 नगर परिषदों पर बंपर जीत।

भाजपा (BJP): केवल 1 नगर पंचायत पर सिमटी।

शिंदे गुट (शिवसेना): 1 सीट पर जीत।

निर्दलीय (अपक्ष): 1 सीट पर कब्जा।

कुल 11 निकायों के नतीजों में से भाजपा केवल एक जगह अपनी लाज बचा सकी है। 8 प्रमुख नगर परिषदों पर कांग्रेस का कब्जा यह दर्शाता है कि ग्रामीण और शहरी मतदाताओं ने भाजपा की नीतियों और स्थानीय नेतृत्व को सिरे से खारिज कर दिया है।

मुनगंटीवार का दर्द: “पार्टी शनिशिंगणापुर जैसी हो गई है”

इस करारी हार के बाद पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुनगंटीवार का दर्द छलक उठा। आम तौर पर पार्टी लाइन का पालन करने वाले मुनगंटीवार ने मीडिया के सामने जो बयान दिए, वे भाजपा के अंदरूनी कलह (अंतर्गत गटबाजी) की पोल खोलने के लिए काफी हैं।

मुनगंटीवार ने बेहद मार्मिक और तंज भरे लहजे में कहा, “हमारी पार्टी अब शनिशिंगणापुर जैसी हो गई है।”

इस बयान के गहरे सियासी मायने हैं। शनिशिंगणापुर अपनी ‘दरवाजा रहित’ घरों की परंपरा के लिए जाना जाता है। मुनगंटीवार का इशारा साफ था कि पार्टी ने बाहरी लोगों के लिए दरवाजे पूरी तरह खोल दिए हैं। बिना किसी जांच-परख के अन्य दलों से आए नेताओं को पार्टी में शामिल किया गया और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। मुनगंटीवार के अनुसार, “विदर्भ के चार जिलों में से किसी को भी मंत्री पद नहीं दिया गया, जबकि बाहरी लोगों के लिए सत्ता के दरवाजे खोल दिए गए।”

“मेरी पावर कम कर दी गई…” 

शायद पहली बार सुधीर मुनगंटीवार ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि पार्टी हाईकमान ने उनके पर कतर दिए हैं। उन्होंने कहा, “मेरी पार्टी कमांड ने मेरी पावर कम कर डाली है।”

यह बयान विदर्भ की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। मुनगंटीवार, जो कभी विदर्भ में भाजपा का चेहरा हुआ करते थे, आज खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी और शीर्ष नेतृत्व द्वारा स्थानीय नेताओं को कमजोर करने की रणनीति ने ही भाजपा को इस दुर्दशा में पहुंचाया है। मतदाताओं ने इसी आंतरिक कलह और निराशा के कारण भाजपा को रिजेक्ट कर दिया है।

विजय वड्डेटीवार की तारीफ या अपनी पार्टी पर तंज?

मुनगंटीवार का दर्द यहीं नहीं रुका। उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी और कांग्रेस के कद्दावर नेता, नेता प्रतिपक्ष विजय वड्डेटीवार की तारीफ करते हुए अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को आईना दिखाया।

मुनगंटीवार ने कहा, “कांग्रेस की पार्टी कमांड ने विजय वड्डेटीवार की ताकत बढ़ाई, उनका अभिनंदन।”

यह तुलना भाजपा नेतृत्व के लिए एक सीधा संदेश है। मुनगंटीवार यह कहना चाहते हैं कि जहाँ कांग्रेस ने अपने स्थानीय सेनापति (वड्डेटीवार) को पूरी ताकत और स्वतंत्रता दी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें जीत मिली; वहीं भाजपा ने अपने सेनापतियों (मुनगंटीवार और अन्य) की ताकत कम की, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।

कांग्रेस का उदय और वड्डेटीवार का कद

इस चुनाव ने कांग्रेस नेता विजय वड्डेटीवार का कद राज्य की राजनीति में और बढ़ा दिया है। 8 नगर परिषदों पर जीत हासिल करना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इसे ‘एंटी-इनकंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) के साथ-साथ कांग्रेस की माइक्रो-मैनेजमेंट की जीत के रूप में देखा जा रहा है। वड्डेटीवार ने साबित कर दिया है कि विदर्भ में अभी भी कांग्रेस की जड़ें गहरी हैं और अगर सही नेतृत्व मिले, तो पार्टी वापसी कर सकती है।

अपने बयानों के अंत में सुधीर मुनगंटीवार ने एक दार्शनिक अंदाज अपनाया, जो उनकी हताशा और संयम दोनों को दर्शाता है। उन्होंने कहा:

“हमें जीत आए तो गर्व नहीं, और हार गए तो शर्म नहीं।”

यह वाक्य भले ही सुनने में अच्छा लगे, लेकिन राजनीति में ‘जो जीता वही सिकंदर’ होता है। यह बयान एक तरह से हार की जिम्मेदारी स्वीकार करने जैसा है, लेकिन साथ ही यह संदेश भी है कि वे इस हार से टूटे नहीं हैं, बल्कि आहत हैं—विपक्ष से नहीं, बल्कि अपनों से।

कुल मिलाकर, चंद्रपुर की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है। उन्होंने भाजपा की गुटबाजी और अहंकार को नकारा है और कांग्रेस के जमीनी काम पर भरोसा जताया है। सुधीर मुनगंटीवार का “पावर कम” होने वाला बयान आने वाले दिनों में भाजपा के भीतर एक नए घमासान की शुरुआत हो सकता है। क्या भाजपा हाईकमान इस चेतावनी को समझेगा, या विदर्भ हाथ से फिसलता जाएगा? यह तो वक्त ही बताएगा।

फिलहाल, चंद्रपुर में ‘कमल’ मुरझा गया है और ‘हाथ’ मजबूती से खड़ा है।

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