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ताडोबा के ‘टाइगर कॉरिडोर’ पर खनन का वार; 20 हजार लोगों ने बुलंद की आवाज, क्या सरकार सुनेगी पुकार?

– ‘लोहारडोंगरी बचाओ, ताडोबा बचाओ’ अभियान हुआ तेज: विनाशकारी खनन परियोजना के खिलाफ जन-आंदोलन की ललकार

चंद्रपुर :- चंद्रपुर जिले के नागभीड़ तालुका में प्रस्तावित लोहारडोंगरी लौह-अयस्क खनन परियोजना के खिलाफ अब रणभेरी बज चुकी है। बाघों के संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा के लिए ‘सेव लोहारडोंगरी, सेव ताडोबा’ अभियान ने अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लिया है।

पर्यावरण प्रेमियों द्वारा शुरू की गई ऑनलाइन याचिका ने महज कुछ ही दिनों में 20 हजार से अधिक हस्ताक्षरों का ऐतिहासिक आंकड़ा पार कर लिया है। नागरिकों का बढ़ता आक्रोश इस बात का सबूत है कि लोग अब विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, प्रस्तावित खनन क्षेत्र ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व और उमरेड-पाउनी-करांडला वन्यजीव अभयारण्य को जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण ‘टाइगर कॉरिडोर’ है।

इस क्षेत्र में 60 से अधिक बाघों का निवास है।

खनन शुरू होने से जैव-विविधता पूरी तरह नष्ट हो सकती है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जंगलों के कटने से मानव-वन्यजीव संघर्ष और भी खौफनाक हो जाएगा।

आंकड़े दे रहे हैं गवाही

पिछले 5 वर्षों में जिले में जंगली जानवरों के हमलों में लगभग 200 लोगों की जान जा चुकी है, जिसमें से अकेले वर्ष 2025 में 47 ग्रामीणों की मौत हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे में जंगल काटकर खदान बनाना ‘आग में घी’ डालने जैसा होगा।

मैदान में उतरे विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता

चंद्रपुर की ‘इको-प्रो’ संस्था के नेतृत्व में पर्यावरणविदों, वकीलों, प्राध्यापकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की टोलियां लोहारडोंगरी क्षेत्र का दौरा कर रही हैं। राज्य वन्यजीव बोर्ड के पूर्व सदस्य बंदू धोतरे ने इस परियोजना का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि यह केवल चंद्रपुर का नहीं, बल्कि पूरे बाघ संरक्षण अभियान के अस्तित्व का सवाल है।


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